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Tuesday, April 27, 2010
कड़ी मेहनत, ईमानदारी एवं आज्ञापालन सफलता का मूलमंत्र
Monday, October 26, 2009
विद्यार्थियों के अभिक्षमता परीक्षण में जुटे हायर सेकेंडरी स्कूल
इस हेतु सभी विद्यार्थियों के मध्य वितरित किये जाने वाले पपत्रों को जिला शिक्षा अधिकारी के माध्यम से प्रदेश के सभी हायर सकेडरी स्कूलों तक पहुँचा दिया गया हैं। इन प्रपत्रों के मूल्यांकन के लिए शिक्षकों को काउंसलर मैनुअल दिया गया है।
जिसकी सहायता से इन प्रपत्रों का मूल्यांकन एवं परीक्षण होगा। विद्यार्थियों को प्राप्त प्राप्तांकों के आधार पर संस्था के कॅरियर काउॅसलर उन्हें कॅरियर परामर्श देंगे।
विद्यार्थियों के मनोवैज्ञानिक परीक्षण के लिए मुद्रित प्रपत्र में संचयी कॅरियर काउंसलर प्रपत्र, व्यवहारिक सूची प्रपत्र, व्यक्ति परीक्षण आदि विद्याओं का समावेश किया गया है। इन प्रपत्रों में विद्यार्थी की व्यक्तितगत जानकारी के अलावा पारिवारिक जानकारी, स्वास्थ्य संबंधी मूल्यांकन, व्यक्तिगत विशेषताओं का मूल्यांकन, पाठ्यतर गतिविधियों की जानकारी, छात्र के भविष्य की योजनाएं और समय-समय पर कॅरियर काउंसलर द्वारा दी गई जानकारी के साथ ही व्यावसायिक अभिरुचि के परीक्षण के माध्यम से उसे व्यापार, प्रबंधन, प्रशासन, जनसंचार तथा शिक्षा एवं प्रशिक्षण, स्वास्थ्य विज्ञान, एवं प्रौद्योगिकी, विधि संग्रहालय एवं पुरातत्व विज्ञान, कृषि एवं खाद तथा समाजसेवा आदि के क्षेत्र में प्रविष्ट होने के लिए योग्यता का ऑकलन कर कॅरियर मार्गदर्शन दिया जाएगा।
इसके अलावा विद्यार्थी के व्यक्तित्व का परीक्षण कर यह भी ज्ञात किया जाएगा कि वह अंर्तमुखी, बाह्यमुखी अथवा उभयमुखी है, जिसके आधार पर विद्यार्थी को कॅरियर की दिशाएँ बताई जाएंगी।
उल्लेखनीय है कि समस्त कॅरियर काउंसलर को प्रशिक्षण देने के लिए प्रथम चरण में गत 7 एवं 18 जनवरी को तथा द्वितीय चरण में सेटकॉम के माध्यम से 24 अक्टूबर को प्रशिक्षित किया जा चुका है। सेटकॉम प्रशिक्षण कार्यक्रम में आयुक्त, उच्च शिक्षा श्री आशीष उपाध्याय, योजना के निदेशक डॉ. पंकज त्रिवेदी एवं उपनिदेशक डॉ. पुरुषोत्तम दुबे आदि ने प्रशिक्षण दिया था।
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Sunday, October 25, 2009
कॅरियर काउंसलर्स को मनौवैज्ञानिक परीक्षण में प्रशिक्षण
प्रशिक्षण में तैतीस जिलों के काउंसलर्स ने भाग लिया। इनमें हायर सेकेंडरी स्कूलों के प्राचार्य और व्याख्याता शामिल थे। प्रशिक्षण में विशेषज्ञों द्वारा उन्हें छात्रों के मनौवैज्ञानिक परीक्षण के संबंध में प्रशिक्षण दिया गया। इस मौके पर डॉ. डी.सी. राठी, डा. पुरूषोत्तम दुबे, संयुक्त संचालक लोक शिक्षण श्री के.के. पाण्डे आदि ने प्राचार्यों और व्याख्याताओं को विभिन्न पहुलओं से अवगत कराया।
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Friday, July 31, 2009
खुद की शख्सियत पर नजर रखना भी होता है जरूरी
यह तथ्य सबको पता है कि व्यक्तित्व भविष्य के निर्माण व उन्नति दोनों को ही प्रभावित करती है। लेकिन, व्यक्तित्व कामकाज पर किस हद तक प्रभाव डालती है कम लोग ही जानते हैं। कई लोगों को तो यह बात उस समय समझ में आती है जब वे काफी कुछ खो चुके होते हैं। कुछ प्रोफेशनल्स ऎसे भी हैं, जो अंत तक स्वीकार ही नहीं कर पाते कि उनके व्यक्तित्व में कुछ कमी है, जबकि इसका नुकसान वे आए दिन उठाते रहते हैं।इसके लिए आवश्यक है कि आपको अपने व्यक्तित्व में जो भी कमी नजर आए या फिर आपके जिस व्यवहार के कारण आपको नुकसान उठाना पड़ा हो उसे दूर करने की कोशिश करें। व्यक्तित्व की कमजोरियां जानने के लिए आप मनोवैज्ञानिक परीक्षण की मदद ले सकते हैं। व्यक्तित्व विकास से जुड़े विशेषज्ञ भी आपकी मदद कर सकते हैं।
भाषा पर पकड़
पर्सनॉलिटी विकास के नाम पर कई लोगों का सोचना है कि अपने देश में यदि आपको धड़ल्ले से अंग्रेजी बोलना आती है तो आपके व्यक्तित्व का विकास हो गया है, जबकि वास्तविकता ऎसी नहीं है। भाषा के साथ और भी कई ऎसे कारक हैं जो व्यक्तित्व विकास के लिए महžवपूर्ण भूमिका निभाते हैं। भाषा तो उनमें से एक पार्ट हो सकती है। आज के जमाने में अंग्रेजी सर्वग्राह्य भाषा हो गई है, इसलिए एक पूर्ण व्यक्तित्व के लिए इसका आना आवश्यक है।
प्रोफेशनल्स के लिए
मौजूदा समय में मल्टीनेशनल कंपनियों में इंटरव्यू के दौरान मनोस्थिति जानने के लिए उलटे सवाल किए जाते हैं, तनाव पैदा किए जाते हैं। नियोक्ता यह जानने का प्रयास करते हैं कि आप विपरीत परिस्थितियों में किस प्रकार से हैंडिल कर पाते हैं। तनाव के समय में आप सामने वाले से किस तरह का व्यवहार करते हैं।
कई बार ऎसा होता है कि अच्छे एकेडमिक कòरियर के बावजूद लोगों को इंटरव्यू में सफलता नहीं मिल पाती। इसका कारण काफी हद तक व्यक्तित्व पर निर्भर होता है। आजकल कंपनियां एकेडमिक नॉलेज के साथ ही व्यावहारिक ज्ञान पर ज्यादा घ्यान देती हैं। कंपनियां कर्मचारियों को अपने प्रतिनिधियों के रूप में देखना चाहती हैं, केवल कर्मचारी के रूप में ही नहीं।
सबसे बड़ी कमजोरी
आजकल युवाओं में जल्द ही सब कुछ हासिल करने की प्रवृत्ति विकसित होती जा रही है। आज के युवाओं के पास स्मार्टनेस है, नॉलेज है, लेकिन धैर्य नहीं। वे तत्काल कामयाबी की बुलंदी छूना चाहते हैं। यह आजकल के युवाओं की सबसे बड़ी कमजोरी है। लगातार जॉब बदलते रहना, किसी एक कंपनी में ज्यादा दिन तक नहीं रूकने की प्रवृत्ति इसका एक उदाहरण है।
हाई क्वालीफाइड प्रबंधन की पढ़ाई करने वाले लोगों को भी यह बताया जाता है कि धैर्य के अभाव में वे कुछ भी हासिल नहीं कर सकते। इसके बावजूद युवा उस पढ़ाई के पाठ को निजी जिंदगी में नहीं उतार पाते और जल्द ही सब कुछ हासिल करने के चक्कर में सब कुछ खो बैठते
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Saturday, July 11, 2009
सफलता के लिए इन्हें भी आजमांए..
कोई व्यक्ति ऊंचा काम कैसे पाता है। भाग्य, प्रतिभा या निष्ठा के कारण। जीवन के हर क्षेत्र में ऊंचा काम करने वालों के कुछ गुण और स्वभाव समान होते हैं। इसे कोई भी सीख सकता है। इसका मतलब यह नहीं है कि कोई भी कंपनी के अध्यक्ष पद तक पहुंच सकता है या ओलिंपिक पदक जीत सकता है। जीवन में सफलता पाने के लिए गारफील्ड ने सूत्र दिए हैं। वे इस प्रकार हैं-
काम अपनी रूचि का चुनिए : अपनी रूचि के अनुसार काम चुनना चाहिए। जो पसंद हो वही काम करें। इससे काम में आनंद आता है। इससे सफलता के रास्ते खुलते हैं।
चुनौतीभरे काम की तैयारी : किसी भी कठिन काम को करने के लिए पहले से अभ्यास करना जरूरी है। आमतौर पर हम सिर्फ सपने देखते हैं। हवाई किले बनाते हैं। बैठे-बैठे किले बनाने से सफलता नहीं मिलती। इसलिए सकारात्मक काम करने की जरूरत है।
परिणाम पर ध्यान रखें : अनेक महत्वाकांक्षी तथा परिश्रमी व्यक्ति आदर्श काम करने की भावना से इतने ग्रस्त रहते हैं कि ज्यादा काम नहीं कर पाते। सर्वश्रेष्ठ कार्य वही लोग कर पाते हैं, जो पूर्णत: त्रुटिहीन काम करने के दबाव में नहीं रहते। वे अपनी गलतियों को असफलता नहीं मानते, उनसे अगली बार बेहतर काम करना सीखते हैं।
जोखिम उठाने तैयारी : व्यक्ति के जीवन में नीरसता आए या काम औसत दर्जे का हो तो वे जोखिम उठाने की जगह सुरक्षा को अधिक महत्वपूर्ण मानते हैं। ऊंचाई पर जाने वाले लोग जोखिम उठाने को तैयार रहते हैं। वे इसके लिए पहले से ही मानसिक रूप से तैयार होते हैं।
अपनी सामर्थ्य को कम ने आंकें : ज्यादातर लोग यह समझते हैं कि उन्हें अपनी सीमाएं मालूम हैं, लेकिन हमें जितना कुछ मालूम होता है वह जानकारी नहीं है। वह मिथ्या विश्वास है। यह हमें सीमाओं में बांधता है। ऊंचे लोग काम करने की कृत्रिम सीमाओं की परवाह नहीं करते। वे अपनी भावनाओं, अपनी कार्यप्रणाली और अपने प्रत्यनों की गतिशीलता पर ध्यान केंद्रित करते हैं।
अपने-आप से करें स्पर्धा : काम करने वाले अपने प्रतिद्वंदियों को पीछे करने के बजाय पिछले प्रयत्नों से आगे निकलने की कोशिश करते हैं। ऊंचे काम करने वालों की रूचि किसी भी काम को अपनी कसौटी के अनुसार बेहतर ढंग से करने की होती है, इसलिए वे अलग रहने के बजाय मिल-जुलकर काम करते हैं। अपनी प्रतिभा का ज्यादा से ज्यादा सदुपयोग करते हैं।
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Thursday, May 21, 2009
तरक्की का राजमार्ग है समय प्रबंधन
कुछ लोग ऑफिस में समय से पहले आते हैं। ऑफिस में अपना काम पूरा करने के लिए देर तक रूकते हैं। हर समय हड़बड़ाहट उनके काम में देखने को मिलती है। यही नहीं अपनी खुद की लाइफ जीने के लिए भी उनके पास समय नहीं होता। यदि यह आपके साथ भी है, तो एक बार सोचने की जरूरत है। इसकी वजह काम की अधिकता न होकर, काम की सही प्लानिंग न करना भी हो सकता है। किसी भी काम को अगर प्लानिंग के साथ किया जाए, तो वह बेहतर परिणाम देता है। टाइम प्लानिंग एक बहुत ही जरूरी कदम है, जो काम को बेहतर बनाने में खासा सहायक है।
समय की कीमत
समय की कीमत को जानना जरूरी है। जिस तरह से आज हर किसीके जीवन में आर्थिक सुरक्षा उसकी मूल आवश्यकता है, तभी उसके कदम प्रगति की ओर बढ़ पाते हैं। धन-उपार्जन के लिए समय का सदुपयोग करना बहुत जरूरी है। समय का दुरूपयोग करने का मतलब होगा धन कमाने की संभावना को गंवा देना।
कई बार हम छोटी-छोटी चीजों को खरीदने के लिए बाजार के कई चक्कर लगाते हैं। ऎसे में एक तो पेट्रोल खर्च होता है, दूसरा और सबसे महत्वपूर्ण कि आपका समय उसमें बरबाद होता है। अपने अमूल्य समय का नुकसार न करें। अपने हर सेकंड को समय की प्लानिंग में शामिल करें। क्योंकि , छोटी-छोटी बचत ही बाद में मोटी बचत के रूप में सामने आती है।
इसमें उन सभी कामों को शामिल करें, जो प्राथमिक हों या फिर बहुत ही महत्वपूर्ण। यह सूची एक दिन पहले तैयार की जानी चाहिए। यानी हम आज उन कामों की योजना बनाएं जो हमें कल करने हैं।
-अपने हर काम का समय तय कर सकते हैं। घंटों के हिसाब से काम का शेड्यूल बनाने की आदत को टाइमटेबल में शामिल कर लें। ध्यान रहे, अपने टाइमटेबल में उतना ही काम लें, जितना आप कर सकते हैं। रोजाना अपनी लिस्ट को रिवाइज करें। ताकि , सभी काम समय पर पूरे हो जाएं।
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Tuesday, May 5, 2009
वादियों संवारने मे बनाएं अपना भविष्य...
यदि आप प्रकृति प्रेमी हैं और प्रकृति को संवारने की इच्छा रखते हैं तो आप फील्ड लैंडस्केप आर्किटेक्ट बनकर धन, प्रसिद्धि और सम्मान प्राप्त कर सकते हैं। यह क्षेत्र आपको अपनी कल्पना शक्ति को साकार करने का भरपूर अवसर देता है। इस क्षेत्र में आपको नेचर के साथ काम करने का खूब मौका मिलता है।
रहने की जगहों को रमणीक और सुन्दर बनाने और सिमटते हुए भू-भागों को हरा-भरा बनाने के लिए विशेष तैयारी करने की जरूरत होती है। पर्यावरण से जुडे व्यावहारिक पक्षों और उपयोगी मुद्दों को ध्यान में रखकर ऎसा वातावरण बनाना होता है कि देखने वाले को सुकून मिले। इसके लिए ध्यान रखना होता है कि आप छोटे उद्यान, फार्म हाउस, माल्स, रिसोर्ट,टैरेस गार्डन, टाउनशिप और हाउसिंग जैसी बड़ी परियोजनाओं की डिजाइनिंग के साथ साथ किसी रीजन के लिए एन्वायरमेंटल इंपैक्ट असेसमेंट की स्टडी करना भी शामिल है।
इस तरह के अध्ययन में अर्बन ग्रोथ का आकलन, खुली जगहों की जरूरत,शहरों में हरियाली बनाने के विशेष प्रयास करना आदि शामिल हैं। सेंटर फॉर एन्वायरमेंटल प्लानिंग एंड टेक्नोलॉजी यूनिवर्सिटी, अहमदाबाद स्कूल ऑफ प्लानिंग एंड आर्किटेक्चर (एमसीपीए), नई दिल्ली, स्कूल ऑफ आर्किटेक्चर0 एंड प्लानिंग, अन्ना यूनिवर्सिटी, चेन्नई इन संस्थानों में अध्ययन करने के बाद प्रारंभिक वेतन 25,000 रूपए प्रतिमाह हो जाता है। पांच साल बाद यही सेलरी 1 लाखरूपए तक हो सकती है।
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Friday, January 16, 2009
"नेट पर हिंदी के विस्तार की अपार संभावनाएं"
नई दिल्ली। समकालीन हिंदी साहित्य के सशक्त हस्ताक्षर और जामिया मिलिया इस्लामिया विश्वविद्यालय में हिंदी विभाग के प्रोफेसर असगर वजाहत का कहना है कि इंटरनेट पर हिंदी के विस्तार की व्यापक संभावनाएं हैं। इंटरनेट के जरिए हिंदी को विश्व के विभिन्न हिस्सों से जोड़ा जाना चाहिए। इसके लिए इंटरनेट पर हिंदी साहित्य को लोकप्रिय बनाने की आवश्यकता है।
कार्यक्रम में इंटरनेट पर हिंदी के प्रसार में ब्लॉगिंग के हस्तक्षेप पर भी चर्चा हुई। "हिंद-युग्म" के संस्थापक शैलेश भारतवासी ने बड़ी संख्या में ब्लॉग जगत से जुड़ने की वकालत की। कार्यक्रम के अंत में असगर वजाहत ने भी अपनी कुछ कहानियों को सुनाया।
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Wednesday, January 14, 2009
पर्यटन मे है अपार संभावनाएं..
विश्वव्यापी मंदी के बावजूद पर्यटन क्षेत्र में विकास की दर 14 प्रतिशत सालाना से अधिक दर्ज की गई है। पर्यटन मंत्री अंबिका सोनी के हाल के एक वक्तव्य के अनुसार, प्रति वर्ष इस क्षेत्र में दो लाख से अधिक ट्रेंड कर्मियों के लिए रोजगार सृजित होते हैं, पर इस मांग की तुलना में आपूर्ति कहीं कम है।
देश में ऐतिहासिक इमारतों, किलों, धरोहरों, प्राकृतिक सौंदर्य से पूर्ण स्थलों, खूबसूरत समुद्री तटों, रमणीक हिमाच्छादित पर्वत श्रृंखलाओं की कमी नहीं है। इनके प्रति टूरिस्ट में आकर्षण पैदा करना तथा विलेज टूरिज्म, इकोटूरिज्म, एडवेंचर टूरिज्म, क्रूज टूरिज्म, मेडिकल टूरिज्म के साथ इन्हें जोडने की दिशा में तमाम नीतियां बनाई जा रही हैं।
ऐसे में नि:संदेह पर्यटन क्षेत्र में रोजगार के असीम अवसर भविष्य में उभरकर सामने आएंगे, जिनका लाभ युवा उठा सके हैं। इस क्रम में यह बताना भी जरूरी है कि विदेशी और क्षेत्रीय भाषाओं के जानकारों के लिए इस क्षेत्र में रोजगार पाना कहीं अधिक आसान होगा।
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Tuesday, January 6, 2009
हौसला अफजाईं से भरिए लोगों में कामयाबी का जज्बा...
किसी ने ठीक ही कहा है कि "यदि लोग खुद पर भरोसा करना सीख जाएं, तो वे स्वयं के बारे में सोची गई काबलियत से कहीं अधिक उपलब्धियां हांसिल कर सकते हैं।" परन्तु अफसोस इस बात का है इस दुनिया में ज्यादातर लोग खुद कम काबिल एवं अपनी कमियों को बढा कर देखने के आदी हो गए हैं , जिसके कारण वे अपनी जिन्दगी की मंजिल तक नहीं पहुंच पाते हैं।
आज के समय में भी बैण्ड किसी भी देश की आर्मी का एक अभिन्न अंग है। उत्साह बढाने को आजकल चीयर लीडिंग की भी संज्ञा दी जाती है और इसका खेलों में जबरदस्त इस्तेमाल हो रहा है।
खेलों में कुछ लोग अपनी विशेष क्रियाओं से दर्शकों और अपनी टीम को अच्छी परफॉर्मेस के लिए उत्साहित करते हैं। कहते हैं कि इसका पहला प्रयोग अमरीका में 1880 के अन्त में एक स्कूल के एथलेटिक प्रतियोगिता में किया गया था। इस प्रतियोगिता में दर्शकों की ओर से बारी-बारी बोले गए विशेष नारों ने टीम का बेहद उत्साहवर्धन किया और टीम ने अच्छे परिणाम भी दिखाए।
सन् 1898 में अमरीका की मिनेसोटा यूनिवर्सिटी के एक स्टूडेंट ने अपने कुछ सहायकों के साथ फुटबाल मैंच में जबरदस्त चीयर लीडिंग करी और दर्शकों के साथ खिलाडियों का दिल जीत लिया। फिर क्या था अब तो तकरीबन प्रत्येक टुर्नामेंट में चीयर लीडिंग करने की होड सी लग गई। प्रारम्भ में चीयर लीडिंग के लिए छ: पुरूषों की टीम होती थी, परन्तु 1923 के बाद से इसमें लडकियों ने भी भाग लेना प्रारम्भ कर दिया। आज इसमें अधिकतर लडकियां ही भाग लेती हैं।
धीरे-धीरे इस चीयर लीडिंग एक्टिविटी में डांस, जिम्नास्टिक, टम्बलिंग आदि का भी जमकर समावेश हुआ। चीयर लीडर्स की यूनीफॉर्म और अधिक आकर्षक होती चली गई। आकर्षक होने की होड में कुछ ग्लैमर के इनपुट आने से यह कई जगह एक मोरल इश्यू भी बन गया। परन्तु अभी भी यह संसार के कई प्रतिष्ठित टुर्नामेंट का एक अभिन्न अंग है जिसमें अब ट्वन्टी-ट्वन्टी क्रिकेट मैच भी शामिल हो गए हैं।
अमरीका में तो नेशनल चीयर लीडर्स एसोशियन के नाम से एक संस्था भी है। संसार की "वल्र्ड चीयर लीडिंग एसोशियन" प्रतिष्ठित टी.वी. चैनलों के सहयोग से चीयर लीडिंग के टुर्नामेंट भी कराती है, जिसमें लाखों लोग पार्टिसिपेट करते हैं। आज संसार में "चीयर लीडिंग" एक इण्डस्ट्री बन चुका है। जिसमें जिम्नास्टिक, डांस, कोरियोग्राफी, फिटनेस आदि सीखाई जाती हैं। कई दुकान वाले चीयर लीडिंग से संबंधित जूते, ड्रेसेज, बुक्स आदि बेचकर धन बटोर रहे हैं। भारत में इसका क्या असर रहेगा, यह तो समय ही बताएगा, परन्तु इसका स्कोप जबरदस्त है।
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Saturday, January 3, 2009
नौकरी जुनून बन जाए तो कहने क्या....
करियर में आगे बढ़ने के लिए अपना पैशन ढूंढना बेहद जरूरी है। आप जो कर रहे हैं, अगर वह करना आपको अच्छा लगता है, तो आपको हर दिन वही करना चाहिए। बचपन से हमारे अंदर किसी एक चीज के लिए पैशन जग जाता है। वह कुछ भी हो सकता है जैसे लिखना, गाना, बोलना आदि। जुनून आपके रहने के तरीके को बदल देता है। लेकिन ज्यादातर लोग अपना पैशन ढूंढ नहीं पाते हैं।
अपना पैशन कैसे ढूंढें
कई बार ऎसा होता है कि आपका पैशन पहले से ही आपकी लाइफ में होता है, लेकिन आप उसे ढूंढ नहीं पाते। यह देखें कि ऎसी कौन सी चीज है, जो बहुत समय से आपके साथ है या जो बहुत समय से आप चाहते हैं या करना चाहते हैं। शायद यही आपके जीवन का पैशन हो। इसी को पाने की राह पर चल पड़ें, तब ही आपका जीवन पूर्ण होगा। जुनून आपसी रिश्तों को भी सुधारता है, क्योंकि ऎसे व्यवहार से आप अपने परिवार और आसपास की चीजों को बहुत पसंद करने लगते हैं। आपका परिवार आपको खुश देखकर वैसे भी बहुत खुश होगी।
लाइफ में पैशन होने का एक और फायदा है, वह यह कि इससे दूसरे लोग भी प्रेरित होते हैं। अपने पैशन की वजह से आप बहुत से लोगों के प्रेरणा स्रोत बन सकते हैं। लेकिन कई बार ऎसा होता है कि पैशन ढूंढ लेने के बाद भी लोग संघर्ष करते हैं। अगर आप सजग नहीं रहेंगे, तो आपका पैशन आपसे दूर भी हो सकता है।
जब आप अपना जुनून ढूंढ लें, तो कभी इसे अपने से दूर न होने दें। हमेशा सकारात्मक लोगों के साथ ही रहें, ताकि जिन्दगी के प्रति आपका पैशन खत्म न हो। साथ ही ऎसी किताबें पढ़ें, जो आपको प्रेरित करें। कार्यक्रम सुने । अगर आप किसी दुविधा में हैं, तो सब चीजें समय पर छोड़ दें। सही समय आने पर सब खुद-ब-खुद ठीक हो जाता है। बस आप अपनी सोच को सकारात्मक बनाए रखें।
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Sunday, December 28, 2008
काश हम कर पाते मीठा मीठा गप्प कड़वा कड़वा थू...
कहते हैं कि आदमी की सोच ही उसकी जीवन की दिशा तय कर देती है। ऐसे मे कितना अच्छा होता अगर हर इंसान अपने साथ हुई केवल मीठी और सुखद बातों को ही याद रख पाता, दुख-दर्द पहुंचाने वाली तमाम बुरी बातों को भूल जाता।
दरअसल, इंसानी दिमाग सूचनाओं को इकट्ठा करने और उन सूचनाओं की प्रोसेसिंग करने में कंप्यूटर की तरह फंक्शन करता है। कंप्यूटर में इन दोनों भूमिकाओं के लिए अलग-अलग डिवाइस होते हैं। जहां कंप्यूटर का हार्ड डिस्क सूचनाएं इकट्ठा करता है, वहीं इसका सेंट्रल प्रोसेसिंग यूनिट (सीपीयू) इन्फर्मेशन प्रोसेसिंग का काम करता है। लेकिन जहां तक हमारे मस्तिष्क का सवाल है, माना जाता है कि उसके अंदर मौजूद एक ही सेल के अंदर ये दोनों काम होते हैं। इस सेल को हम 'न्यूरॉन्स' के नाम से जानते हैं। रिसर्चर इस बात का पता लगाने की कोशिश में जुटे हैं कि क्या बेन सेल्स के अंदर पाए जाने वाले अलग-अलग किस्म के मॉलिक्यूल (अणु) अलग-अलग तरह की भूमिकाएं निभाते हैं?
अमेरिका के न्यू यॉर्क स्थित सनी डाउनस्टेट मेडिकल सेंटर के रिसर्चरों ने ऐसी रिसर्च की है, जिससे आने वाले वक्त में दिमाग से दुख भरी यादों और किसी चीज की लत को खत्म करने की क्षमता पैदा हो सकती है। रिसर्चरों ने पाया है कि मेमरी को सुरक्षित रखने वाला मॉलिक्यूल पीके जीटा विशेष रूप से जटिल और हाई कैटिगरी की मेमरी को स्टोर करता है जो किसी प्राणी की स्थिति, डर और कामों के बारे में विस्तृत सूचनाएं मुहैया कराता है। लेकिन पीके जीटा मॉलिक्यूल का इन सूचनाओं की प्रोसेसिंग करने या इसे व्यक्त करने की क्षमता पर नियंत्रण नहीं होता। यह खोज संकेत देती है कि पीके जीटा मॉलिक्यूल ब्रेन की कंप्यूटिंग क्षमता को बरकरार रखते हुए दिमाग से कड़वी यादों को मिटाने में मददगार साबित हो सकता है।
इस स्टडी के नतीजे विस्तार से पब्लिक लाइब्रेरी ऑफ साइंस बायॉलजी के दिसंबर अंक में छपे हैं। इस पेपर को तैयार करने वाले साइंटिस्टों में एक डॉक्टर फेंटन के अनुसार, अगर आगे इस दिशा में रिसर्च कामयाब रही तो हम भविष्य में पीके जीटा मेमरी इरेजर के आधार पर दिमाग से बुरी यादों को मिटाने वाली कई थेरपी ढूंढ पाएंगे। लोगों के मन से नकारात्मक यादों को खत्म कर देने से उन्हें न केवल दुखद यादों से छुटकारा मिल पाएगा बल्कि यह डिप्रेशन, सामान्य रूप से पैदा होने वाली चिंता, फोबिया, सदमे के बाद पैदा होने वाली स्ट्रेस और ऐडिक्शन का इलाज करने में भी मददगार साबित होगा।
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Saturday, December 27, 2008
क्लीनिकल शोध क्षेत्र मे हैं कैरियर के सुनहरे अवसर..
भारत में क्लिनिकल रिसर्च का बाजार लगभग 50 फीसदी की दर से बढ रहा है। अंतरराष्ट्रीय क्लिनिकल रिसर्च बाजार करीब 17।8 अरब डॉलर का है। भारत में वर्ष 2010 तक 50 हजार प्रोफेशनल्स की दरकार। डिप्लोमा, पोस्ट ग्रेजुएट डिप्लोमा आदि कोर्स उपलब्ध। भारत में शुरुआती वेतन प्रति माह 15 से 25 हजार रुपये।
क्लिनिकल इंडस्ट्री
भारत में क्लिनिकल ट्रॉयल इंडस्ट्री करीब 30 करोड डॉलर का है और वर्ष 2010 तक बढ कर यह इंडस्ट्री दो अरब डॉलर तक पहुंच जाने की उम्मीद है। गौरतलब है कि दुनिया की प्रमुख दवा कंपनियां अब क्लिनिकल रिसर्च संबंधी जरूरतों के लिए भारतीय बाजार की ओर रुख कर रही हैं।
योग्यता और कोर्स
क्लिनिकल रिसर्च के कोर्स में एंट्री के लिए विज्ञान में स्नातक होना जरूरी है। इसके अलावा, डी.फार्मा, बी.फार्मा, एम.फार्मा आदि के स्टूडेंट्स भी इस कोर्स में प्रवेश ले सकते हैं। कई प्रतिष्ठित संस्थानों से क्लिनिकल रिसर्च में डिप्लोमा, पोस्ट ग्रेजुएट डिप्लोमा आदि की जा सकती है।
कहां- कहां हैं संभावनाएं
एक अनुमान के मुताबिक, दुनिया भर में क्लिनिकल रिसर्च के क्षेत्र में करीब ढाई लाख से ज्यादा पद खाली हैं। वहीं योजना आयोग की एक रिपोर्ट के अनुसार, देश में क्लिनिकल रिसर्च के क्षेत्र में करीब 30 से 50 हजार प्रोफेशनल्स की कमी है। इंस्टीट्यूट ऑफ क्लिनिकल रिसर्च एजुकेशन ऐंड ट्रेनिंग, मुम्बई के असिस्टेंट डायरेक्टर अजीत मराठे कहते हैं, क्लिनिकल प्रोफेशनल्स की मांग और सप्लाई में भारी अंतर के कारण ही हमने अपना ट्रेनिंग इंस्टीटयूट शुरू किया है।
इसकी प्रमुख वजह यह है कि यहां प्रशिक्षित कर्मियों और प्रशिक्षण संस्थानों की बेहद कमी है। अंतरराष्ट्रीय स्तर पर इस उद्योग में बहुत अच्छा वेतन मिलता है, जो सालाना 40 हजार डॉलर से लेकर एक लाख डॉलर तक होता है। भारत में शुरुआती सालाना सैलॅरी 1।8 लाख से लेकर पांच लाख रुपये तक होती है। क्यूरी मानवता कैंसर सेंटर, नासिक के चीफ सर्जिकल ओनकोलॉजिस्ट डॉ. राज वी. नागरकर कहते हैं, भारतीय डॉक्टर अपनी प्रैक्टिस छोडकर क्लिनिकल ट्रॉयल के क्षेत्र में उतरना नहीं चाहते, क्योंकि यहां डॉक्टरी का पेशा ज्यादा सम्मानजनक माना जाता है।
बहुत से डॉक्टरों को क्लिनिकल ट्रायल और इसमें उपलब्ध अवसरों के बारे में पता ही नहीं है। मंदी के चलते फार्मास्युटिकल कंपनियां नए प्रोजेक्ट्स हाथ में भले ही न लें, लेकिन जो-जो प्रोजेक्ट चल रहे हैं, उनको पूरा करने के लिए अभी भी बडी संख्या में कुशल प्रोफेशनल्स की जरूरत है। मराठे कहते हैं, तेज गति से बढोत्तरी के बावजूद भारत में अच्छे क्लिनिकल प्रैक्टिस वाले प्रशिक्षित इंवेस्टिगेटर्स, बायो-एनालिटिकल साइंटिस्ट और फार्माकोकाइनेटिक्स की काफी कमी है।
प्रशिक्षण संस्थान
इंस्टीटयूट ऑफ क्लिनिकल रिसर्च एजुकेशन ऐंड ट्रेनिंग, मुम्बई, पूना और नासिक (पीजी डिप्लोमा इन क्लिनिकल रिसर्च, फार्माकोविजिलेंस और एमएसएसी इन क्लिनिकल रिसर्च) www.icreat.इन इंस्टीट्यूट ऑफ क्लिनिकल रिसर्च, मुम्बई, दिल्ली और बेंगलुरु (पीजी डिप्लोमा इन एडवांस क्लिनिकल रिसर्च) www.icriindia.कॉम क्लिनिकल रिसर्च एजुकेशन ऐंड मैनेजमेंट एकेडमी, मुम्बई, बेंगलुरु और दिल्ली (एडवांस पीजी डिप्लोमा इन क्लिनिकल रिसर्च आदि) www.cremaindia.org
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Wednesday, December 24, 2008
दमदार बायोडाटा यानि नौकरी का पासपोर्ट...
आजकल नौकरियों की हालत एक अनार सौ बीमार वाली हो गई है। एक ही नौकरी के लिए सैकड़ों उम्मीदवारों की लाइन लगी होती है। ऎसे में सभी को तो इंटरव्यू के लिए बुलाया नहीं जा सकता, लिहाजा कॉल के लिए चयन रिज्यूमे के आधार पर होता है। ऎसे में रिज्यूमे तैयार करते समय कुछ खास बातों का ध्यान रखना जरूरी है।
* पद की जरूरतों के मुताबिक हो — रिज्यूमे को देखने के दौरान आपकी एक छवि बना ली जाती है। ऎसे में अगर देखने वाले को जॉब प्रोफाइल से मैच करती चीजें नहीं मिलेंगी, तो वह आपको नौकरी के लिए सही कैसे मानेगा। इसलिए बायोडेटा का डिजाइन ऎसा रखें, जिसमें आपकी काबिलियतें व अनुभव उभरकर आएं। ध्यान रखिए कि इस डिजाइन के जरिये आपको पहली ही नजर में पढ़ने वाले को प्रभावित करना है।
* सही सामग्री चुनें — रिज्युमे का अच्छा डिजाइन सही जानकारी के बिना कुछ नहीं कर पाएगा, इसलिए इसमें दी जाने वाली जानकारियों का खास ध्यान रखें। इंटरव्यू के लिए आने वाले बुलावों की संख्या इस बात पर काफी निर्भर करती है कि आप अपने बारे में जानकारी किस तरह देते हैं।
* पावर वर्ड चुनें — अंकों और संख्यात्मक वाले जानकारी का प्रयोग एक अच्छी छवि बनाता है, जबकि आम व्क्तव्य जल्दी ही भुला दी जाती हैं। साथ ही, नौकरी के लिए आवेदन करते समय शब्दों का चयन बेहद सोच-समझकर करें। आपकी कोशिश पद के जरूरत से मेल करते शब्दों को चुनने की होनी चाहिए।
* कूट शब्द —नौकरी के लिए विज्ञापन देते समय कई तरह के कूट-शब्द इस्तेमाल किए जाते हैं। इन शब्दों को पहचानें और इन्हें रिज्यूमे में डालें। इससे आपका प्रभाव बहुत अच्छा बनेगा।
*शीर्षक व इबारतें — किसी भी जॉब के लिए हजारों की संख्या में आवेदन आते हैं। ऎसे में आपका बायोडाटा इतना इंप्रेसिव होना चाहिए कि वह पांच सेकंड में ही दूसरों को प्रभावित कर दे। इसके लिए आप अपनी स्किल्स व योग्यताओं को अलग-अलग हिस्सों में बांटकर हेडिंग्स के जरिये पेश करें। हालांकि ये शीर्षक नौकरी की जरूरत से मेल खानीचाहिए।
* नियोक्ता की जरूरत पहचानें — आज के प्रतियोगी युग में आपको जॉब तभी मिल सकती है, जब आप खुद को अच्छे से प्रेजेंट करने के साथ जॉब ऑफर करने वाले की जरूरत को भी समझेंगे। ऎसे में आप अपने रिज्यूमे में यह लिख सकते हैं कि इस जॉब में आने वाली परेशानियों को आप किस तरह सुलझाने में सक्षम हैं।
* नौकरी के मुताबिक बायोडाटा — हर जगह एक ही रिज्यूमे भेज देने से काम नहीं चलेगा, बल्कि इसमें जॉब की जरूरत के मुताबिक बदलाव लाना चाहिए। यह बात आपके कवर लेटर पर भी लागू होती है। इस बात का विशेष ध्यान रखें कि गलत वर्तनी और कमजोर संरचना के वाक्यों से उम्मीदवार के बारे में नकारात्मक प्रभाव पड़ता है। इसलिए रिज्यूमे को त्रुटि रहित बनाने का प्रयास करें। यह सुनिश्चित कर लें कि आपका रिज्यूमे साफ-सुथरा व देखने में सुंदर लगे। इसके लिए आपको उच्च गुणवत्ता के सफेद कागज को प्रयोग में लेना चाहिए। रिज्यूमे का फाइनल प्रिंट लेने से पहले एक प्रिंट लेकर उसे अच्छी तरह से देख लें, यह सुनिश्चित कर लें कि उसमें कोई त्रुटि अब नहीं बची है।
* स्किल्स दिखाएं — अपने स्किल्स को पहचानें व इंटरव्यू के दौरान उसे बताएं भी । इसके साथ ही रिज्यूमे में इस बात को अच्छी तरह से दिखांए । ध्यान रखें कि इंटरव्यू के दौरान इस पक्ष पर आपसे सबसे ज्यादा सवाल पूछे जा सकते हैं, लिहाजा इसे उसी तरह पेश करें।
* वेतन के मुताबिक छवि बनाएं — नौकरी के स्तर व वेतन वृद्धि को ध्यान में रखते हुए ही रिज्यूमे तैयार करें। साथ ही, अपनी ऎसी छवि भी तैयार करें, जिससे लगे कि आप वाकई इस स्तर तक पहुंचने के काबिल हैं।
* जानकारी सही तरह रखें — रिज्यूमे तैयार करते समय अकसर लोग महत्वपूर्ण जानकारी को नीचे कर देते हैं और कम जरूरी जानकारियां पहले डाल देते हैं। इसलिए जब भी अपना रिज्यूमे तैयार करें, तो उस दौरान सारी जानकारी को प्राथमिकताओं के हिसाब से व्यवस्थित करें। ध्यान रखें कि एक अच्छी व दमदार बिन्दु बाद में आने वाली अच्छी जानकारी को ज्यादा प्रभावी बना देती है।
* अपना रिज्यूमे विशिष्ट बनाएं — अपनी क्षमताओं व कुशलताओं को आप ऎसे वर्गीकृत कर प्रस्तुत करें जिसमें आप सहजता का अनुभव करें। यह आपको संबंधित व पेशेवर अनुभवों से दूसरे कार्यानुभव को एक अतिरिक्त वर्ग बनाकर अलग करने में सहयोग करेगा। इस प्रकार आप संबंधित कुशलताओं को अपने रिज्यूमे के शीर्ष पर वर्ग में रख सकते हैं ताकि वे पहले पढ़े जा सकें। संबंधित अनुभव के स्थान पर आप अपने क्षेत्र के अनुभव को वर्ग शीर्षक में लिख सकते हैं, जैसे व्यापारिक अनुभव, इंजीनियरिंग अनुभव, मानव सेवा अनुभव, विक्रय अनुभव आदि।
यह सब लिखते हुए इस बात का ध्यान रखें कि रिज्यूमे में कोई ऎसी बात नहीं लिखें, जिससे कि आप को इन्टरव्यू के दौरान किसी भी प्रकार की असुविधा का सामना करना पड़े। इसमें वही बातें और अनुभव लिखें जिसे आप पूरा करते हों, ऎसी बातें या ऎसे तथ्य नहीं डाले जाने चाहिए जो झूठे हों।
ध्यान रहे कि इन्टरव्यू लेने वाला आपके रिज्यूमे के आधार पर ही आपके व्यक्तित्व का आकलन करता है और उसी के आधार पर आपसे पूछे जाने वाले सवालों का स्तर भी तय किया जाता है। ऎसे में आधारहीन बातों का रिज्यूमे में उल्लेख आपको ही परेशानी में डाल सकता है। प्रयास करें कि ऎसे किसी भी तथ्य या अनुभव का उल्लेख न हो जो पूरा नहीं करते हों या फिर उसमें आपकी पकड़ कमजोर हो। इसके बजाय यह ज्यादा अच्छा है कि कमजोर पक्षों का उल्लेख रिज्यूमे में हो ही न।
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Sunday, December 21, 2008
नई दिशांए-चिप लेवल इंजीनियरिंग
सूचना प्रौद्योगिकी के इस युग में चिप लेवल इंजीनियरों की मांग एकदम से बढ़ी है। लेकिन यह भी सच है कि आईटी शिक्षा प्राप्त करने वाले अधिकतर प्रशिक्षुओं को चिप लेवल के बारे में कोई जानकारी ही नहीं है। चिप लेवल इंजीनियरिंग कोर्स करने के तुरंत बाद कम्प्यूटर निर्माण, एसेम्बलिंग करने वाली राष्ट्रीय/बहुराष्ट्रीय कंपनियों में अच्छे ऑफर मिलने लगते हैं। आजकल कंप्यूटर निर्माण करने वाली कंपनियां चिप लेवल इंजीनियरों को ही ऊंचे वेतनमान पर तुरंत रोजगार दे रही हैं। आज संपूर्ण आईटी उद्योग सच माइने में चिप लेवल इंजीनियर की कार्य-कुशलता पर ही टिका हुआ है।
चिप लेवल क्या है
लेकिन इससे बिल्कुल अलग है चिप लेवल पाठ्यक्रम । इस कोर्स को करने वाला व्यक्ति खराब कार्ड, पार्ट या पुर्जे को सिर्फ बदलने का ही काम नहीं करता बल्कि यह खराब कार्ड या पार्ट को दुरूस्त करके उसे पूर्ववत काम करने लायक बना देता है। जाहिर है कार्ड बदलने पर खर्च अधिक आता है जबकि ठीक कर देने में नाम मात्र खर्च आता है। इसलिए आजकल कार्ड लेवल इंजीनियरों की जगह कंप्यूटर निर्माण मेंटेनेंस असेम्बिलंग करने वाली कंपनियों चिप लेवल इंजीनियरों की भर्ती कर रही हैं। यही वजह है कि कंप्यूटर हार्डवेयर का कोर्स अत्यधिक रोजगारात्मक हो गया है।
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Tuesday, December 16, 2008
समाज सेवा में भी हैं कैरियर बनाने की संभावनाएं भरपूर...
कार्यो को पूरा करने के लिए आज प्रशिक्षित सामाजिक कार्यकर्ताओं की मांग बढती जा रही है। यदि आप भी सोशल वर्क में ऑनर्स कर रहे हैं, तो इस कोर्स पर बेहतर पकड बनाने के लिए मेहनत और लगन के साथ तैयारी में जुट जाएं।
इस कोर्स के अंतर्गत समाज सेवा सिद्धांत एवं प्रयोग, समाज का ढांचा, मानवीय वद्धि एवं व्यक्तित्तव विकास, सामाजिक समस्याएं, समाज सेवा की विधियों, समाज सेवा के क्षेत्र, समाजिक नीति एवं योजना, समाजिक विकास, संचार जैसे अनिवार्य विषयों के अलावा, कुछ वैकल्पिक विषय भी पढाए जाते हैं। इसके साथ-साथ सोशल वर्क के व्यावहारिक पहलुओं को सीखने के लिए सामाजिक कल्याण एवं विकास के क्षेत्र में कार्यरत एजेंसियों में स्टूडेंट्स को सप्ताह में दो अथवा तीन दिन के लिए फील्ड वर्क भी करना पडता है।
जरूरी है व्यावसायिक शैली
समाज सेवा के विद्यार्थियों के लिए यह जरूरी है कि वे क्लास रूम में इसके मूलभूत को प्राध्यापकों से जानें और समझें। साथ ही, इस विषय पर व्यवसायिक ढंग हासिल करने के लिए इन बातों पर भी अमल करें :
आत्मानुशासन का सख्ती से पालन करें।
समय प्रबंधन पर दें खास ध्यान।
दिशापूर्ण अथवा लक्ष्य केन्द्रित तरीके अपनाएं।
अभिव्यक्ति एवं लेखन क्षमता को उन्नत करें।
सीखें डॉक्यूमेंटेशन करना
सोशल वर्क में डॉक्यूमेंटेशन का विशेष महत्व है। इसमें डायग्राम्स, ग्राफ, टेबल्स एवं चार्टो का प्रयोग करते हुए लेखन कार्य करना होता है। लगातार अभ्यास से बहुत जल्द आप खुद में सुधार देखेंगे। हां, विषय संबंधी की-वर्ड्स को याद करना न भूलें।
करें आत्म-मूल्यांकन
इस पाठ्यक्रम के विद्यार्थियों को सामाजिक समस्याओं चाहे वे व्यक्तिगत स्तर पर हों, सामूहिक स्तर पर अथवा सामुदायिक स्तर पर, उनका समाधान करना पडता है। इसमें व्यक्तित्व एवं व्यवहार अत्यंत महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं। इसलिए अपने व्यवहार में सरलता और सहजता लाएं। व्यक्तित्व एवं व्यवहार संबंधी कमजोरियों को तत्काल दूर करने का प्रयास करें।
मैदानी अभ्यास नियमित करें
यह विषय समाज के विभिन्न पहलुओं से संबंधित है। इसके अंतर्गत संपूर्ण समाज एक प्रयोगशाला है। फील्ड प्रैक्टिस लर्निग के लिए सामाजिक संरचना, सामाजिक घटनाओं, मानवीय संबंधों, सामाजिक मनोविज्ञान को समझें।
अवलोकन व विश्लेषण
सोशल वर्क पाठ्यक्रम के अंतर्गत फील्ड वर्क के दौरान ऐसे अनेक अवसर आते हैं, जब विद्यार्थियों को कुछ न कुछ अवलोकन करना होता है। तर्कपूर्ण सोच का प्रयोग करते हुए अवलोकन किए गए बिंदुओं का विश्लेषण करें।
कार्यशालाओं में जाएं और ज्ञान पाएं
समकालीन सामाजिक समस्याओं एवं चुनौतियों तथा उनके समाधान के मॉडलों को समझने हेतु संगोष्ठियों एवं कार्यशालाओं में भागीदारी बेहतर मंच प्रदान करती हैं। इनमें सक्रिय रूप से भाग लेने से आप अपने विषय में रुचि लेंगे और उसे गहराई से समझेंगे।
किताबों से करें दोस्ती
समाज सेवा विषय के आधारभूत सिद्धांतों को समझने के लिए कुछ अच्छी किताबें हैं, जिनसे आपको इस विषय पर पकड बनाने में आसानी होगी। इनके नाम हैं:
ह्यूमन सोसाइटी-किंग्सले डेविस
द हैंड बुक ऑफ सोशल साइकोलॉजी (वॉल्यूम एक से पांच)
जी.लिन्डजी एवं ई.एंडरसन
इंटरनेशनल सोशल वर्क-एल.एम.हीली
मेथडोलॉजी ऑफ रिसर्च इन सोशल साइंसेज-ओ.आर.कृष्णास्वामी
सोशल वर्क एंड एम्पॉवरमेंट-राबर्ट एडम्स
कम्यूनिटी ऑर्गनाइजेशन इन इंडिया- एच.वाई.सिद्दीकी
मैगजींस एवं जर्नल्स
नवीनतम जानकारियों से खुद को जागरूक रखने के लिए विद्यार्थी इन पत्रिकाओं व जर्नल को देख सकते हैं:
योजना, कुरूक्षेत्र, सोशल वेलफेयर, इंडियन जर्नल्स ऑफ सोशल वर्क, कंटेम्पररी सोशल वर्क और सोशल वर्क रिव्यू
क्या करें, क्या न करें
प्रत्येक विषय अथवा अवधारणा को समझने के बाद ही आगे बढें।
नियमित रूप से पढने की आदत डालें और नोट्स बनाएं।
फील्ड वर्क करते समय पर्यवेक्षक के दिशा-निर्देशों का पालन करें।
जहां तक संभव हो केस स्टडीज जरूर पढें।
मैदानी काम को मौज मस्ती न समझें।
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Tuesday, December 9, 2008
समूह अध्ययन से बढ़ें आगे..भाग-दो
सफल अध्ययन समूह के बनाने के लिए उसके लक्ष्णों को जानना भी जरूरी हैं। इसके लिए यह सुनिश्चित किया जाना चाहिए कि प्रत्येक सदस्य समूह चर्चा में भाग लेता हो। एक समय में एक ही समूह सदस्य को बोलना चाहिए। समूह के अन्य सदस्यों को उसकी बातों को बिना व्यवधान डाले सुनते हों।
समूह के सभी सदस्यों का दर्जा समान हो और वे एक-दूसरे का सम्मान करते हों। गु्रप के सभी सदस्यों को एक-दूसरे की आलोचना करने का अधिकार हो, लेकिन याद रखें, यह आलोचना व्यक्तिगत नहीं, बल्कि रचनात्मक होनी चाहिए। समूह के सदस्य एक-दूसरे से सवाल पूछने में सहज महसूस करें।
सकारात्मक नजरिए के साथ-साथ यह सोच हो- हम मिलकर यह काम कर सकते हैं।
अध्ययन समूह की सफलता के लिए इन बातों से बचना भी जरूरी होता है।
ध्यान रखें कि अध्ययन समूह अपने कार्यसूची और लक्ष्य से न भटके।
अध्ययन समूह समाजिक समूह में न बदल जाए।
बिना तैयारी के पढ़ाई के सत्र में कोई भी सदस्य भाग न ले।
सभी सदस्य ईमानदारी के साथ गु्रप को अपना योगदान दे।
समूह में नकारात्मक विचारों को जगह न दें।
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Monday, December 8, 2008
समूह अध्ययन से बढ़ें आगे-भाग-एक
राजेश क्षत्रिय मप्र लोक सेवा आयोग के की परीक्षा पास कर नौकरी में आए। क्षेत्रीय सहकारिता बैंक में प्रबंधक हैं। जब भी उनसे कोई पूछता है कि उनकी सफलता का राज क्या है, तो वे अपने छोटे से अध्ययन समूह का नाम लेना नहीं भूलते। जब वे कॉलेज में थे, तभी उन्होंने एक अध्ययन समूह बनाया था। आज उनके गुट के सभी लडके एक से बढकर एक जगह पर काम कर रहे हैं। दरअसल, अध्ययन समूह के बहुत से फायदे होते हैं। समूह मे अध्ययन से आपका समक्ष तो बढ़ती ही है, इससे आपको चर्चा एवं परीक्षा की तैयारी में भी सहायता मिलती है।समूह अध्ययन से पढाई व तैयारी के दौरान सहयोग मिलता है। अगर किसी कारणवश पढाई के प्रति आपकी प्रेरणा में कमी आ जाती है, तो ऐसी स्थिति में गु्रप के अन्य सदस्य आपको प्रोत्साहित करते हैं।
बहुत से लोग क्लास में टीचर से सवाल पूछने में हिचकिचाते हैं। ऐसे विद्यार्थियों के लिए समूह अध्ययन बहुत फायदेमंद होता है। वे अपने अध्यययन समूह में आसानी से अपने सवाल पूछ सकते हैं।
अध्ययन समूह का हिस्सा बनने के बाद आपको अपने अध्ययन के प्रति और भी गंभीर होना होगा। इसका कारण यह है कि गु्रप के हर सदस्य की तैयारी दूसरे सदस्य की तैयारी पर निर्भर करेगी। अगर आप अच्छी तैयारी नहीं करेंगे, तो समूह के अन्य सदस्यों की पढाई पर इसका बुरा असर पडेगा।
समूह के सदस्य पढाई के दौरान नई जानकारियों और अवधारणाओं को सुनकर उन पर चर्चा भी करते हैं। इस तरह आपमें एक अच्छे श्रोता और वक्ता के गुणों का भी विकास होगा।
इतना ही नहीं, समूह के सदस्यों से आपको पढ़ाई के नए तौर तरीके भी मिल सकते है।
आप समूह के अन्य सदस्यों के कक्षाओं मे बनाए गए नोट्स की तुलना कर सकते हैं। ऐसी चीजें, जो क्लास में नोट करने से रह गई हों, उन्हें पूरा कर सकते हैं।
दूसरे, समूह सदस्यों से कुछ ऐसी जानकारियां भी मिल सकती हैं, जो आपकी किताब में न हो या आपके टीचर ने आपको न बताया हो! इस तरह से आपकी जानकारी में वृद्धि हो सकती है।
कभी-कभी पढाई काफी नीरस हो जाती है। ऐसी स्थिति में आप समूह सदस्यों के अध्यययन को मजेदार बना सकते हैं।
कैसे शुरू करें समूह अध्ययन
अध्ययन समूह बनाना आसान काम नहीं है। राहुल और उसके दोस्तों ने ऐसा ही एक समूह बनाने की सोची, लेकिन कुछ ही दिनों में उन्हें लगा कि उनका अध्ययन समूह पढ़ाई करने की बजाय गप्पे लडाने में ज्यादा रुचि लेने लगा है। कहीं आपका समूह भी ऐसा न करने लगे, इसलिए किसी को भी अपने समूह में शामिल करने से यदि आपको निम्नलिखित प्रश्नों का उत्तर हां में मिले, तभी उसे अपने समूह में शामिल करें :
क्या उसमें पढने की लगन है?
क्या उसमें विषयों की समझ है?
क्या उस पर भरोसा किया जा सकता है?
क्या वह दूसरों के विचारों का सम्मान करता है?
क्या आपको उसका व्यवहार पसंद है?
अगर आपको सभी सवालों के उत्तर हां में मिलते हैं, तो अपने मित्र या सहपाठी को समूह में शामिल कर सकते हैं। इस तरह तीन से पांच लोगों को इकट्ठा कर एक अध्ययन समूह बना सकते हैं। ध्यान रहे, अध्ययन समूह में इससे ज्यादा लोगों को शामिल नहीं करना चाहिए।
समूह के साथ मिलकर तय कीजिए कि आपका अध्ययन का दौर कितना लंबा हो! सप्ताह में दो या तीन बार मिलना ठीक होता है। अध्ययन सत्र 60-90 मिनट का होना चाहिए।
पढा़ई का स्थान घर या कॉलेज के पास हो, जहां आसानी से पहुंचा जा सके। ऐसी जगह हो जहां भीड और शोर-शराबा न हो। इसके लिए कोई खाली क्लासरूम बेहतर होगा।
अपने अध्ययन समूह का लक्ष्य तय कीजिए। आपका लक्ष्य, नोट्स अद्यतन करना या उनकी तुलना करना, विमर्श, पढ़ाई और परीक्षा की तैयारी हो सकता है।
अपने अध्ययन सत्र की कार्यसूची तय कीजिए तथा यह भी तय कीजिए कि उस सत्र में प्रत्येक समूह सदस्य को क्या कार्य करने हैं!
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Saturday, December 6, 2008
इग्नू की पहुंच -भाग-दो
वर्ष 1985 में संसदीय अधिनियम द्वारा स्थापित इंदिरा गांधी राष्ट्रीय मुक्त विश्वविद्यालय ने मात्र दो दशकों में दुनिया के सबसे बडे विश्वविद्यालय के रूप में अपनी पहचान बना ली है। 1987 से इसने शैक्षिक कार्यक्रम चलाने आरंभ किए। सबसे पहले प्रबंध में डिप्लोमा एवं दूर शिक्षा में डिप्लोमा कार्यक्रम शुरू किए गए। आज यह विश्वविद्यालय 21 अध्ययन विद्यापीठों, 58 क्षेत्रीय केंद्रों, 1804 अध्ययन केंद्रों-दूर अध्ययन केंद्रों तथा विदेशों में स्थित 46 केंद्रों के नेटवर्क के माध्यम से भारत सहित विश्व के 32 देशों में लगभग 18 लाख स्टूडेंट्स की शैक्षिक आवश्यकताओं को पूरा कर रहा है। वर्तमान समय में इग्नू के 138 सर्टिफिकेट, डिप्लोमा, डिग्री व पीएचडी प्रोग्राम्स के तहत करीब 1300 कोर्स संचालित हैं।
खास बात यह भी है कि केवल एजुकेशन के लिए समर्पित देश के विशेष उपग्रह एडुसैट के 20 सितंबर, 2004 को अंतरिक्ष में प्रक्षेपित किए जाने तथा अंतर-विश्वविद्यालय कंसोर्टियम की स्थापना से इग्नू ने भारत को टेक्नोलॉजी समर्थ शिक्षा के नए युग में प्रवेश करा दिया है। आज इग्नू के पास 134 दो-तरफा वीडियो कॉन्फ्रेंसिंग सेंटर हैं। साथ ही, सभी क्षेत्रीय अध्ययन केंद्रों को एडुसैट से जोडा गया है, ताकि सैटेलाइट के माध्यम से दूर-दराज के विद्यार्थियों तक शिक्षा का आदान-प्रदान किया जा सके। इग्नू में वर्ष 2005 में परिसर रोजगार सहायक प्रकोष्ठ (सीपीसी) की स्थापना की गई, जिसका उद्देश्य अपने विद्यार्थियों को उनके अनुकूल जॉब दिलाने में सहायता देना है।
स्टूडेंट्स को कोर्स पर आधारित पर्याप्त स्टडी मैटीरियल भी उपलब्ध कराया जाता है। ताकि वे रेगुलर पढाई कर सकें। समय-समय पर एग्जाम होता है और फाइनल एग्जाम क्वालिफाई करने के बाद उन्हें रेगुलर कोर्सो की भांति मान्यता प्राप्त प्रमाण पत्र प्रदान किया जाता है, जिसके आधार पर वे सरकारी और निजी या फिर विदेश में कहीं भी अपने अनुकूल जॉब पा सकते हैं। महत्वपूर्ण बात यह है कि ऐसे कोर्स बेहद कम फीस में और अपने आस-पास स्थित स्टडी सेंटर से ही किए जा सकते हैं। ऐसे कोर्स उच्च शिक्षा के क्षेत्र में उपलब्ध हैं और विश्वविद्यालय अनुदान आयोग द्वारा मान्यता प्राप्त हैं।
उच्च शिक्षा हासिल करने वाले स्टूडेंट्स की लगातार बढती संख्या को देखते हुए डिस्टेंस लर्निग से शिक्षा प्रदान करने वाले ऐसे संस्थान तेजी से लोकप्रिय हो रहे हैं। इस माध्यम के उपलब्ध हो जाने से उन स्टूडेंट्स को काफी लाभ हो रहा है, जिन्हें महानगरों या बडे शहरों में न जा पाने के कारण उच्च शिक्षा से वंचित रहना पडता था। ये कोर्स ग्रामीण और सुदूरवर्ती क्षेत्रों के युवाओं के लिए बेहद उपयोगी हैं। इन कोर्सो की लोकप्रियता को देखते हुए आज भारत में इग्नू के अलावा दस अन्य विश्वविद्यालय भी डिस्टेंस एजुकेशन से तमाम कोर्स उपलब्ध करा रहे हैं। इन विश्वविद्यालयों के अलावा देश भर में आज 54 से अधिक डिस्टेंस लर्निग इंस्टीटयूट भी हायर एजुकेशन की जरूरत को पूरा कर रहे हैं।
जर्नलिज्म, कम्युनिकेशन ऐंड क्रिएटिव राइटिंग : इसके तहत पीजी डिप्लोमा इन ट्रांसलेशन, जर्नलिज्म ऐंड मास कम्युनिकेशन, ऑडियो प्रोग्राम प्रॉडक्शन, रेडियो प्रसारण, डिप्लोमा इन क्रिएटिव राइटिंग इन इंग्लिश आदि शामिल हैं।
एरिया स्फेसिफिक अवेयरनेस ऐंड मैनपॉवर डेवलॅपमेंट प्रोग्राम्स : इस प्रोग्राम के तहत शामिल विषय बेहद महत्वपूर्ण हैं। इनमें शामिल विषयों के नाम हैं-पीजी डिप्लोमा इन डिजास्टर मैनेजमेंट, इनवॉयरमेंट ऐंड सस्टेनेबल डेवलॅपमेंट, डिप्लोमा इन वैल्यू एडेड प्रॉडक्ट फ्रॉम फ्रूट्स ऐंड वेजिटेबल्स, पल्सेज ऐंड ऑयलसीड्स, मीट टेक्नोलॉजी आदि हैं। पता : इंदिरा गांधी नेशनल ओपेन यूनिवर्सिटी (1985), मैदान गढी, नई दिल्ली,फोन : 91-11-29532321, 29535062-65,
ई-मेल rmohan@ignou.ac.in,
वेबसाइट www.ignou.ac.in
इग्नू डिस्टेंस ओपेन लर्निग के माध्यम से उच्च और वोकेशनल शिक्षा प्रदान करने वाला देश का सबसे बडा संस्थान है। इसकी सबसे बडी चुनौती देश के दूर-दराज के उन इलाकों तक उपयोगी शिक्षा का प्रसार करना है, जहां के लोग शहर जाकर पढाई नहीं कर सकते। इसके लिए हमने सैटेलाइट की मदद ली है। हमारी कोशिशों से इसरो ने इसी उद्देश्य से एडुसैट का प्रक्षेपण किया था। इसके अलावा, अब हम कम्युनिटी रेडियो, कम्युनिटी कॉलेज और अब मोबाइल एजुकेशन जैसे माध्यमों का भी इस्तेमाल कर रहे हैं।
टेक्नोलॉजी का और किस तरह प्रयोग हो रहा है?
हम गांव-गांव में उपलब्ध एसटीडी बूथ के माध्यम से टेली सेंटर/विलेज नॉलेज सेंटर मैनेजमेंट कोर्स शुरू कर रहे हैं। इसके तहत बूथ चलाने वाले व्यक्ति को ट्रेनिंग देकर डिप्लोमा प्रदान किया जाएगा। यह ट्रेंड व्यक्ति गांव के लोगों को कॉल सेंटर, टेलीकम्युनिकेशन ट्रेनिंग देगा, ताकि वे टेलीकॉम इंडस्ट्री में बेहतर जॉब पा सकें। इसके लिए इग्नू टेलीसेंटरडॉटओआरजी के साथ टाई-अप कर रहा है। इस प्रोग्राम के तहत एक लाख से अधिक टेलीसेंटर्स व विलेज नॉलेज सेंटर्स मैनेजर्स बनाना है।
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Friday, December 5, 2008
कामकाजी प्रशिक्षण के बेहतर अवसर मुहैया कराता है इग्नू...
रवि शंकर विश्वकर्मा मप्र के बुंदेलखण्ड के एक सुदूर गांव में रहते हैं और संयुक्त परिवार के सदस्य हैं। खेती-बाडी और बढईगिरी से गुजारा करने वाले उनके परिवार की आर्थिक स्थिति बहुत अच्छी नहीं है। किसी तरह उन्होंने बारहवीं तक की पढाई की। वह कोई कामकाजी प्रशिक्षण लेकर खुद का कोई उद्यम आरंभ करना चाहते थे, लेकिन उनके आस-पास ऐसी सुविधा नहीं थी।
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