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Saturday, June 6, 2009

नाम, दाम व जनकल्याण के लिए अपनाएं एनजीओ..

आजकल सरकारी नौकरियों की कमी, बढ़ती जनसंख्या और अपने स्वयं के काम के प्रति युवाओं का बढ़ता रूझान स्वयंसेवी संगठनों की स्थापना की ओर स्वाभाविक रूप से बढ़ रहा है। सरकार की कल्याणकारी योजनाएं और अन्तरराष्ट्रीय स्तर पर मिलने वाली मदद ने भी युवाओं को आकर्षित किया है।नाम-दाम और पुरस्कारों के चलते तथा अच्छा काम करने वालों को सदैव के लिए जमा जमाया काम पीढि़यों को हस्तांतरित करने की स्थिति के चलते लोगों में इसे आजीविका का साधन बनाने का मौका मिला है।

समस्या
आपको किसी ऎसी ज्वलंत समस्याओं को ढूंढना होगा जो जन सामान्य से जुड़ी हो। आपके क्षेत्र के लोग उसका समाधान नहीं ढूंढ पा रहे हों। सरकार को भी इसका समाधान नहीं सूझ रहा हो।लोग के हाल-बेहाल से विश्व समुदाय का ध्यान आकर्षित किया जा सकता हो। आप उसका समाधान कैसे करेंगे। उसे मिशन के रूप में निर्धारित कीजिए।
समाधान के लिए शोध करें
इस समस्या के समाधान के लिए वैज्ञानिक और व्यावाहारिक योजना का निर्माण करें। समस्याओं पर शोध करें और अपना नजरिया प्रेक्टिकल के धरातल पर बनाएं। योजना का स्वरूप, कार्य करने की संभावनाएं, कार्य के परिणाम मिलने की न्यूनतम अवधि, कार्य योजना को क्रियान्वयन करने के लिए साधनों की जरूरत और मिशन के सफल होने की संभावनाओं पर विचार करें। अनुमानित बजट का निर्धारण करें तथा उसको जुटाने की संभावनाओं पर विचार करें।
समूह बनाकर काम करें
अपनी टीम के गठन के लिए अपने जैसे विचारों वाले युवा साथियों की खोज करें। समान विचार वाले यदि उम्र में बुजुर्ग व्यक्ति भी जुड़ना चाहते हों तो उन्हें भी जोडिए।वे टिककर काम करेंगे। उनके अनुभवों का लाभ मिलेगा।संस्था संगठनों में काम करने का अनुभव होना चाहिए। इससे उन्हें काम करने के लिए फील्ड मिलेगा और अपेक्षित परिणाम दे पाएंगे।टीम के चयन में इन बातों का विशेष ध्यान रखें कि कहीं उनमें पैसे के प्रति अतिशय मोह तो नहीं है। लक्ष्य और ध्येय के प्रति समर्पित हुए बिना एनजीओज में चमत्कारिक परिणाम नहीं दिए जा सकते। कार्यकर्ताओं की आजीविका और सुविधाओं का ध्यान रखे बिना लम्बे समय तक उन्हें जोड़कर रखा नहीं जा सकता। इससे लाभ मिलेगा तब जब वर्कस का ध्यान रखा जाएगा।
संस्थागत शुरूआत करें
अपने विचारों को मूर्त और कानूनी जामा पहनाने के लिए आपको विशेष संस्था का गठन करना होगा। नियम उप नियम बनाएं ताकि सरकारी मदद मिल सके। संस्था का संविधान निर्माण करने के लिए नियम-उपनियमों का निर्धारण आप अन्य एंजीओज के संविधान को देखकर कर सकते हैं। संगठन की रूपरेखा ,सदस्यों की संख्या,वित्तीय वर्ष/अकाउंटिंग साइकिल,प्लानिंग,वर्किग मैथोडोलॉजी शामिल है।
पंजीकरण
भारत में कार्य करना बड़ा सरल है। यहां बिना लाभ-बिना नुकसान के कार्य करने वाले संगठनों को कंपनी एक्ट धारा-25 के अन्तर्गत ट्रस्ट,संस्था,सोसायटी या प्राइवेट लिमिटेड कंपनी के तौर पर रजिस्ट्रेशन करवा सकते हैं।
पूंजी का इंतजाम करें
नॉन प्रोफिट संस्थाओं के लिए यह ज्यादा महत्वपूर्ण है कि वे वित्तीय व्यवस्था कैसे करेंगे। आप तीन तरह से फंड जुटा सकते हैं। कारपोरेट सेक्टर आपके लिए मददगार साबित हो सकता है।ट्रस्ट और फाउंडेशन भी आर्थिक सहयोग प्रदान करते हैं। जन सामान्य का सहयोग और उत्पाद बेचकर भी आर्थिक संसाधन जुटा सकते हैं। सदस्यों से सदस्यता शुल्क,चंदा, विदेशी एजेंसियों से सहायता प्राप्त की जा सकती है। सरकार के कई मंत्रालय भी वित्तीय सहायता प्रदान करते हैं किंतु इसके लिए संस्था का रजिस्ट्रेशन तीन साल पुराना होना चाहिए।
साख बनाएं
सोसाइटी,देश, अन्तरराष्ट्रीय स्तर पर अपनी साख बनाएं। आपके कार्य की ईमानदारी का लोग लोहा मानें। आपके कार्य मात्र कागजी न हों। जनता पर उसका प्रभाव दिखाई देना चाहिए। इंस्पेक्शन को गंभीरता से लें। ऎसा करके आप आगे बढ़ सकते हैं।

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Friday, January 16, 2009

"नेट पर हिंदी के विस्तार की अपार संभावनाएं"

नई दिल्ली। समकालीन हिंदी साहित्य के सशक्त हस्ताक्षर और जामिया मिलिया इस्लामिया विश्वविद्यालय में हिंदी विभाग के प्रोफेसर असगर वजाहत का कहना है कि इंटरनेट पर हिंदी के विस्तार की व्यापक संभावनाएं हैं। इंटरनेट के जरिए हिंदी को विश्व के विभिन्न हिस्सों से जोड़ा जाना चाहिए। इसके लिए इंटरनेट पर हिंदी साहित्य को लोकप्रिय बनाने की आवश्यकता है।

असगर वजाहत ने यह बात राजधानी स्थित गांधी शांति प्रतिष्ठान के सभागार में "हिंद-युग्म" संस्था द्वारा इंटरनेट पर हिंदी भाषा, साहित्य, कला और तकनीक मसले पर आयोजित एक कार्यक्रम में कही।कार्यक्रम में कहानीकार और अंतर्राष्ट्रीय हिंदी संस्था कथा के महासचिव तेजेन्द्र शर्मा और युवा कथाकार गौरव सोलंकी ने कथा पाठ किया। सोलंकी ने दो छोटी कहानियां "डर के आगे" और "तुम्हारी बांहों में मछलियां क्यो नहीं है" पढ़ीं, वहीं शर्मा ने "पासपोर्ट" नामक कहानी का पाठ किया।
कार्यक्रम में इंटरनेट पर हिंदी के प्रसार में ब्लॉगिंग के हस्तक्षेप पर भी चर्चा हुई। "हिंद-युग्म" के संस्थापक शैलेश भारतवासी ने बड़ी संख्या में ब्लॉग जगत से जुड़ने की वकालत की। कार्यक्रम के अंत में असगर वजाहत ने भी अपनी कुछ कहानियों को सुनाया।

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Wednesday, January 14, 2009

पर्यटन मे है अपार संभावनाएं..

विश्वव्यापी मंदी के बावजूद पर्यटन क्षेत्र में विकास की दर 14 प्रतिशत सालाना से अधिक दर्ज की गई है। पर्यटन मंत्री अंबिका सोनी के हाल के एक वक्तव्य के अनुसार, प्रति वर्ष इस क्षेत्र में दो लाख से अधिक ट्रेंड कर्मियों के लिए रोजगार सृजित होते हैं, पर इस मांग की तुलना में आपूर्ति कहीं कम है।

यही कारण है कि भारी संख्या में लोगों को ट्रेंड करने के लिए प्रत्येक राज्य में कम से कम एक होटल मैनेजमेंट एवं फूड क्राफ्ट इंस्टीट्यूट खोलने की भावी योजना केंद्रीय सरकार के स्तर पर बनाई जा रही है। इतना ही नहीं, तीन सप्ताह की ट्रेनिंग देकर स्कूल कॉलेज के युवाओं को भी इस क्षेत्र से जोडने की योजना है।
देश में ऐतिहासिक इमारतों, किलों, धरोहरों, प्राकृतिक सौंदर्य से पूर्ण स्थलों, खूबसूरत समुद्री तटों, रमणीक हिमाच्छादित पर्वत श्रृंखलाओं की कमी नहीं है। इनके प्रति टूरिस्ट में आकर्षण पैदा करना तथा विलेज टूरिज्म, इकोटूरिज्म, एडवेंचर टूरिज्म, क्रूज टूरिज्म, मेडिकल टूरिज्म के साथ इन्हें जोडने की दिशा में तमाम नीतियां बनाई जा रही हैं।
ऐसे में नि:संदेह पर्यटन क्षेत्र में रोजगार के असीम अवसर भविष्य में उभरकर सामने आएंगे, जिनका लाभ युवा उठा सके हैं। इस क्रम में यह बताना भी जरूरी है कि विदेशी और क्षेत्रीय भाषाओं के जानकारों के लिए इस क्षेत्र में रोजगार पाना कहीं अधिक आसान होगा।

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Tuesday, January 6, 2009

हौसला अफजाईं से भरिए लोगों में कामयाबी का जज्बा...

किसी ने ठीक ही कहा है कि "यदि लोग खुद पर भरोसा करना सीख जाएं, तो वे स्वयं के बारे में सोची गई काबलियत से कहीं अधिक उपलब्धियां हांसिल कर सकते हैं।" परन्तु अफसोस इस बात का है इस दुनिया में ज्यादातर लोग खुद कम काबिल एवं अपनी कमियों को बढा कर देखने के आदी हो गए हैं , जिसके कारण वे अपनी जिन्दगी की मंजिल तक नहीं पहुंच पाते हैं।

ऎसे में यह कहना गलत नहीं होगा कि इस संसार में उन व्यक्तियों की सख्त जरूरत हैं, जो अपने शब्दों और क्रियाओं से दूसरों में जोश भर सकें और उन्हें कुछ बडा करने की भावनाओं से ओत-प्रोत कर सकें। पुराने समय में भी सेना के साथ चारण भाट आदि चला करते थे, जो अपनी जोशीली रचनाओं से सैनिकों में जोश भरा करते थे।
आज के समय में भी बैण्ड किसी भी देश की आर्मी का एक अभिन्न अंग है। उत्साह बढाने को आजकल चीयर लीडिंग की भी संज्ञा दी जाती है और इसका खेलों में जबरदस्त इस्तेमाल हो रहा है।
खेलों में कुछ लोग अपनी विशेष क्रियाओं से दर्शकों और अपनी टीम को अच्छी परफॉर्मेस के लिए उत्साहित करते हैं। कहते हैं कि इसका पहला प्रयोग अमरीका में 1880 के अन्त में एक स्कूल के एथलेटिक प्रतियोगिता में किया गया था। इस प्रतियोगिता में दर्शकों की ओर से बारी-बारी बोले गए विशेष नारों ने टीम का बेहद उत्साहवर्धन किया और टीम ने अच्छे परिणाम भी दिखाए।
सन् 1898 में अमरीका की मिनेसोटा यूनिवर्सिटी के एक स्टूडेंट ने अपने कुछ सहायकों के साथ फुटबाल मैंच में जबरदस्त चीयर लीडिंग करी और दर्शकों के साथ खिलाडियों का दिल जीत लिया। फिर क्या था अब तो तकरीबन प्रत्येक टुर्नामेंट में चीयर लीडिंग करने की होड सी लग गई। प्रारम्भ में चीयर लीडिंग के लिए छ: पुरूषों की टीम होती थी, परन्तु 1923 के बाद से इसमें लडकियों ने भी भाग लेना प्रारम्भ कर दिया। आज इसमें अधिकतर लडकियां ही भाग लेती हैं।
धीरे-धीरे इस चीयर लीडिंग एक्टिविटी में डांस, जिम्नास्टिक, टम्बलिंग आदि का भी जमकर समावेश हुआ। चीयर लीडर्स की यूनीफॉर्म और अधिक आकर्षक होती चली गई। आकर्षक होने की होड में कुछ ग्लैमर के इनपुट आने से यह कई जगह एक मोरल इश्यू भी बन गया। परन्तु अभी भी यह संसार के कई प्रतिष्ठित टुर्नामेंट का एक अभिन्न अंग है जिसमें अब ट्वन्टी-ट्वन्टी क्रिकेट मैच भी शामिल हो गए हैं।
अमरीका में तो नेशनल चीयर लीडर्स एसोशियन के नाम से एक संस्था भी है। संसार की "वल्र्ड चीयर लीडिंग एसोशियन" प्रतिष्ठित टी.वी. चैनलों के सहयोग से चीयर लीडिंग के टुर्नामेंट भी कराती है, जिसमें लाखों लोग पार्टिसिपेट करते हैं। आज संसार में "चीयर लीडिंग" एक इण्डस्ट्री बन चुका है। जिसमें जिम्नास्टिक, डांस, कोरियोग्राफी, फिटनेस आदि सीखाई जाती हैं। कई दुकान वाले चीयर लीडिंग से संबंधित जूते, ड्रेसेज, बुक्स आदि बेचकर धन बटोर रहे हैं। भारत में इसका क्या असर रहेगा, यह तो समय ही बताएगा, परन्तु इसका स्कोप जबरदस्त है।

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Tuesday, December 16, 2008

समाज सेवा में भी हैं कैरियर बनाने की संभावनाएं भरपूर...

कार्यो को पूरा करने के लिए आज प्रशिक्षित सामाजिक कार्यकर्ताओं की मांग बढती जा रही है। यदि आप भी सोशल वर्क में ऑनर्स कर रहे हैं, तो इस कोर्स पर बेहतर पकड बनाने के लिए मेहनत और लगन के साथ तैयारी में जुट जाएं।

समझें पाठ्यक्रम के मसविदे को
इस कोर्स के अंतर्गत समाज सेवा सिद्धांत एवं प्रयोग, समाज का ढांचा, मानवीय वद्धि एवं व्यक्तित्तव विकास, सामाजिक समस्याएं, समाज सेवा की विधियों, समाज सेवा के क्षेत्र, समाजिक नीति एवं योजना, समाजिक विकास, संचार जैसे अनिवार्य विषयों के अलावा, कुछ वैकल्पिक विषय भी पढाए जाते हैं। इसके साथ-साथ सोशल वर्क के व्यावहारिक पहलुओं को सीखने के लिए सामाजिक कल्याण एवं विकास के क्षेत्र में कार्यरत एजेंसियों में स्टूडेंट्स को सप्ताह में दो अथवा तीन दिन के लिए फील्ड वर्क भी करना पडता है।
जरूरी है व्यावसायिक शैली
समाज सेवा के विद्यार्थियों के लिए यह जरूरी है कि वे क्लास रूम में इसके मूलभूत को प्राध्यापकों से जानें और समझें। साथ ही, इस विषय पर व्यवसायिक ढंग हासिल करने के लिए इन बातों पर भी अमल करें :
आत्मानुशासन का सख्ती से पालन करें।
समय प्रबंधन पर दें खास ध्यान।
दिशापूर्ण अथवा लक्ष्य केन्द्रित तरीके अपनाएं।
अभिव्यक्ति एवं लेखन क्षमता को उन्नत करें।
सीखें डॉक्यूमेंटेशन करना
सोशल वर्क में डॉक्यूमेंटेशन का विशेष महत्व है। इसमें डायग्राम्स, ग्राफ, टेबल्स एवं चार्टो का प्रयोग करते हुए लेखन कार्य करना होता है। लगातार अभ्यास से बहुत जल्द आप खुद में सुधार देखेंगे। हां, विषय संबंधी की-व‌र्ड्स को याद करना न भूलें।
करें आत्म-मूल्यांकन
इस पाठ्यक्रम के विद्यार्थियों को सामाजिक समस्याओं चाहे वे व्यक्तिगत स्तर पर हों, सामूहिक स्तर पर अथवा सामुदायिक स्तर पर, उनका समाधान करना पडता है। इसमें व्यक्तित्व एवं व्यवहार अत्यंत महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं। इसलिए अपने व्यवहार में सरलता और सहजता लाएं। व्यक्तित्व एवं व्यवहार संबंधी कमजोरियों को तत्काल दूर करने का प्रयास करें।
मैदानी अभ्यास नियमित करें
यह विषय समाज के विभिन्न पहलुओं से संबंधित है। इसके अंतर्गत संपूर्ण समाज एक प्रयोगशाला है। फील्ड प्रैक्टिस लर्निग के लिए सामाजिक संरचना, सामाजिक घटनाओं, मानवीय संबंधों, सामाजिक मनोविज्ञान को समझें।
अवलोकन व विश्‍लेषण
सोशल वर्क पाठ्यक्रम के अंतर्गत फील्ड वर्क के दौरान ऐसे अनेक अवसर आते हैं, जब विद्यार्थियों को कुछ न कुछ अवलोकन करना होता है। तर्कपूर्ण सोच का प्रयोग करते हुए अवलोकन किए गए बिंदुओं का विश्लेषण करें।
कार्यशालाओं में जाएं और ज्ञान पाएं
समकालीन सामाजिक समस्याओं एवं चुनौतियों तथा उनके समाधान के मॉडलों को समझने हेतु संगोष्ठियों एवं कार्यशालाओं में भागीदारी बेहतर मंच प्रदान करती हैं। इनमें सक्रिय रूप से भाग लेने से आप अपने विषय में रुचि लेंगे और उसे गहराई से समझेंगे।
किताबों से करें दोस्ती
समाज सेवा विषय के आधारभूत सिद्धांतों को समझने के लिए कुछ अच्छी किताबें हैं, जिनसे आपको इस विषय पर पकड बनाने में आसानी होगी। इनके नाम हैं:
ह्यूमन सोसाइटी-किंग्सले डेविस
द हैंड बुक ऑफ सोशल साइकोलॉजी (वॉल्यूम एक से पांच)
जी.लिन्डजी एवं ई.एंडरसन
इंटरनेशनल सोशल वर्क-एल.एम.हीली
मेथडोलॉजी ऑफ रिसर्च इन सोशल साइंसेज-ओ.आर.कृष्णास्वामी
सोशल वर्क एंड एम्पॉवरमेंट-राबर्ट एडम्स
कम्यूनिटी ऑर्गनाइजेशन इन इंडिया- एच.वाई.सिद्दीकी
मैगजींस एवं जर्नल्स
नवीनतम जानकारियों से खुद को जागरूक रखने के लिए विद्यार्थी इन पत्रिकाओं व जर्नल को देख सकते हैं:
योजना, कुरूक्षेत्र, सोशल वेलफेयर, इंडियन जर्नल्स ऑफ सोशल वर्क, कंटेम्पररी सोशल वर्क और सोशल वर्क रिव्यू
क्या करें, क्या न करें
प्रत्येक विषय अथवा अवधारणा को समझने के बाद ही आगे बढें।
नियमित रूप से पढने की आदत डालें और नोट्स बनाएं।
फील्ड वर्क करते समय पर्यवेक्षक के दिशा-निर्देशों का पालन करें।
जहां तक संभव हो केस स्टडीज जरूर पढें।
मैदानी काम को मौज मस्ती न समझें।

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Tuesday, December 9, 2008

समूह अध्ययन से बढ़ें आगे..भाग-दो

सफल अध्ययन समूह के बनाने के लिए उसके लक्ष्णों को जानना भी जरूरी हैं। इसके लिए यह सुनिश्चित किया जाना चाहिए कि प्रत्येक सदस्य समूह चर्चा में भाग लेता हो। एक समय में एक ही समूह सदस्य को बोलना चाहिए। समूह के अन्य सदस्यों को उसकी बातों को बिना व्यवधान डाले सुनते हों।

यदि किसी सदस्य को कोई सवाल समझ में नहीं आ रहा है या वह कोई काम देता है, तो सभी सदस्य मिलकर उस सवाल का हल खोजने की कोशिश करें। सभी सदस्य अपने काम को करने के लिए तत्पर हों और कोई भी काम तेजी से करते हों।
समूह के सभी सदस्यों का दर्जा समान हो और वे एक-दूसरे का सम्मान करते हों। गु्रप के सभी सदस्यों को एक-दूसरे की आलोचना करने का अधिकार हो, लेकिन याद रखें, यह आलोचना व्यक्तिगत नहीं, बल्कि रचनात्मक होनी चाहिए। समूह के सदस्य एक-दूसरे से सवाल पूछने में सहज महसूस करें।
सकारात्मक नजरिए के साथ-साथ यह सोच हो- हम मिलकर यह काम कर सकते हैं।
अध्ययन समूह की सफलता के लिए इन बातों से बचना भी जरूरी होता है।
ध्यान रखें कि अध्ययन समूह अपने कार्यसूची और लक्ष्य से न भटके।
अध्ययन समूह समाजिक समूह में न बदल जाए।
बिना तैयारी के पढ़ाई के सत्र में कोई भी सदस्य भाग न ले।
सभी सदस्य ईमानदारी के साथ गु्रप को अपना योगदान दे।
समूह में नकारात्मक विचारों को जगह न दें।

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Monday, December 8, 2008

समूह अध्ययन से बढ़ें आगे-भाग-एक

राजेश क्षत्रिय मप्र लोक सेवा आयोग के की परीक्षा पास कर नौकरी में आए। क्षेत्रीय सहकारिता बैंक में प्रबंधक हैं। जब भी उनसे कोई पूछता है कि उनकी सफलता का राज क्या है, तो वे अपने छोटे से अध्ययन समूह का नाम लेना नहीं भूलते। जब वे कॉलेज में थे, तभी उन्होंने एक अध्ययन समूह बनाया था। आज उनके गुट के सभी लडके एक से बढकर एक जगह पर काम कर रहे हैं। दरअसल, अध्ययन समूह के बहुत से फायदे होते हैं। समूह मे अध्ययन से आपका समक्ष तो बढ़ती ही है, इससे आपको चर्चा एवं परीक्षा की तैयारी में भी सहायता मिलती है।
समूह अध्ययन से पढाई व तैयारी के दौरान सहयोग मिलता है। अगर किसी कारणवश पढाई के प्रति आपकी प्रेरणा में कमी आ जाती है, तो ऐसी स्थिति में गु्रप के अन्य सदस्य आपको प्रोत्साहित करते हैं।
बहुत से लोग क्लास में टीचर से सवाल पूछने में हिचकिचाते हैं। ऐसे विद्यार्थियों के लिए समूह अध्ययन बहुत फायदेमंद होता है। वे अपने अध्यययन समूह में आसानी से अपने सवाल पूछ सकते हैं।
अध्ययन समूह का हिस्सा बनने के बाद आपको अपने अध्ययन के प्रति और भी गंभीर होना होगा। इसका कारण यह है कि गु्रप के हर सदस्य की तैयारी दूसरे सदस्य की तैयारी पर निर्भर करेगी। अगर आप अच्छी तैयारी नहीं करेंगे, तो समूह के अन्य सदस्यों की पढाई पर इसका बुरा असर पडेगा।
समूह के सदस्य पढाई के दौरान नई जानकारियों और अवधारणाओं को सुनकर उन पर चर्चा भी करते हैं। इस तरह आपमें एक अच्छे श्रोता और वक्ता के गुणों का भी विकास होगा।
इतना ही नहीं, समूह के सदस्यों से आपको पढ़ाई के नए तौर तरीके भी मिल सकते है।
आप समूह के अन्य सदस्यों के कक्षाओं मे बनाए गए नोट्स की तुलना कर सकते हैं। ऐसी चीजें, जो क्लास में नोट करने से रह गई हों, उन्हें पूरा कर सकते हैं।
दूसरे, समूह सदस्यों से कुछ ऐसी जानकारियां भी मिल सकती हैं, जो आपकी किताब में न हो या आपके टीचर ने आपको न बताया हो! इस तरह से आपकी जानकारी में वृद्धि हो सकती है।
कभी-कभी पढाई काफी नीरस हो जाती है। ऐसी स्थिति में आप समूह सदस्यों के अध्यययन को मजेदार बना सकते हैं।
कैसे शुरू करें समूह अध्ययन
अध्ययन समूह बनाना आसान काम नहीं है। राहुल और उसके दोस्तों ने ऐसा ही एक समूह बनाने की सोची, लेकिन कुछ ही दिनों में उन्हें लगा कि उनका अध्ययन समूह पढ़ाई करने की बजाय गप्पे लडाने में ज्यादा रुचि लेने लगा है। कहीं आपका समूह भी ऐसा न करने लगे, इसलिए किसी को भी अपने समूह में शामिल करने से यदि आपको निम्नलिखित प्रश्नों का उत्तर हां में मिले, तभी उसे अपने समूह में शामिल करें :
क्या उसमें पढने की लगन है?
क्या उसमें विषयों की समझ है?
क्या उस पर भरोसा किया जा सकता है?
क्या वह दूसरों के विचारों का सम्मान करता है?
क्या आपको उसका व्यवहार पसंद है?
अगर आपको सभी सवालों के उत्तर हां में मिलते हैं, तो अपने मित्र या सहपाठी को समूह में शामिल कर सकते हैं। इस तरह तीन से पांच लोगों को इकट्ठा कर एक अध्ययन समूह बना सकते हैं। ध्यान रहे, अध्ययन समूह में इससे ज्यादा लोगों को शामिल नहीं करना चाहिए।
समूह के साथ मिलकर तय कीजिए कि आपका अध्ययन का दौर कितना लंबा हो! सप्ताह में दो या तीन बार मिलना ठीक होता है। अध्ययन सत्र 60-90 मिनट का होना चाहिए।
पढा़ई का स्थान घर या कॉलेज के पास हो, जहां आसानी से पहुंचा जा सके। ऐसी जगह हो जहां भीड और शोर-शराबा न हो। इसके लिए कोई खाली क्लासरूम बेहतर होगा।
अपने अध्ययन समूह का लक्ष्य तय कीजिए। आपका लक्ष्य, नोट्स अद्यतन करना या उनकी तुलना करना, विमर्श, पढ़ाई और परीक्षा की तैयारी हो सकता है।
अपने अध्ययन सत्र की कार्यसूची तय कीजिए तथा यह भी तय कीजिए कि उस सत्र में प्रत्येक समूह सदस्य को क्या कार्य करने हैं!

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Saturday, December 6, 2008

इग्नू की पहुंच -भाग-दो

वर्ष 1985 में संसदीय अधिनियम द्वारा स्थापित इंदिरा गांधी राष्ट्रीय मुक्त विश्वविद्यालय ने मात्र दो दशकों में दुनिया के सबसे बडे विश्वविद्यालय के रूप में अपनी पहचान बना ली है। 1987 से इसने शैक्षिक कार्यक्रम चलाने आरंभ किए। सबसे पहले प्रबंध में डिप्लोमा एवं दूर शिक्षा में डिप्लोमा कार्यक्रम शुरू किए गए। आज यह विश्वविद्यालय 21 अध्ययन विद्यापीठों, 58 क्षेत्रीय केंद्रों, 1804 अध्ययन केंद्रों-दूर अध्ययन केंद्रों तथा विदेशों में स्थित 46 केंद्रों के नेटवर्क के माध्यम से भारत सहित विश्व के 32 देशों में लगभग 18 लाख स्टूडेंट्स की शैक्षिक आवश्यकताओं को पूरा कर रहा है। वर्तमान समय में इग्नू के 138 सर्टिफिकेट, डिप्लोमा, डिग्री पीएचडी प्रोग्राम्स के तहत करीब 1300 कोर्स संचालित हैं।

बढ रही हैं उपलब्धियां
उल्लेखनीय है कि आज देश के उच्च शिक्षा में नामांकित कुल छात्रों में से लगभग 13 प्रतिशत (डिस्टेंस एजुकेशन में कुल स्टूडेंट्स का 50 प्रतिशत से अधिक) की शैक्षिक आवश्यकताएं इग्नू पूरी कर रहा है। डिस्टेंस एजुकेशन में अग्रणी संस्थान के रूप में इसे कनाडा स्थित कॉमनवेल्थ ऑफ लर्निग (सीओएल) ने 1993 में डिस्टेंस एजुकेशन के क्षेत्र में सर्वोत्तम केंद्र के रूप में सम्मानित किया। इसके अतिरिक्त इसे 1999 में डिस्टेंस एजुकेशन के क्षेत्र में सर्वोत्तम सामग्री का पुरस्कार भी मिला।
खास बात यह भी है कि केवल एजुकेशन के लिए समर्पित देश के विशेष उपग्रह एडुसैट के 20 सितंबर, 2004 को अंतरिक्ष में प्रक्षेपित किए जाने तथा अंतर-विश्वविद्यालय कंसोर्टियम की स्थापना से इग्नू ने भारत को टेक्नोलॉजी समर्थ शिक्षा के नए युग में प्रवेश करा दिया है। आज इग्नू के पास 134 दो-तरफा वीडियो कॉन्फ्रेंसिंग सेंटर हैं। साथ ही, सभी क्षेत्रीय अध्ययन केंद्रों को एडुसैट से जोडा गया है, ताकि सैटेलाइट के माध्यम से दूर-दराज के विद्यार्थियों तक शिक्षा का आदान-प्रदान किया जा सके। इग्नू में वर्ष 2005 में परिसर रोजगार सहायक प्रकोष्ठ (सीपीसी) की स्थापना की गई, जिसका उद्देश्य अपने विद्यार्थियों को उनके अनुकूल जॉब दिलाने में सहायता देना है।
वरदान बना ओपेन लर्निग
डिस्टेंस एजुकेशन पढाई का ऐसा माध्यम है, जिसमें टीचर और स्टूडेंट्स अलग-अलग स्थानों पर होते हैं। टेली-कॉन्फ्रेंसिंग के जरिए किसी एक जगह पढा रहे टीचर से देश के अलग-अलग व सुदूरवर्ती क्षेत्रों में बैठे स्टूडेंट्स पढ सकते हैं और उनसे सवाल पूछकर अपनी उत्सुकता शांत कर सकते हैं। खास बात यह है कि स्टूडेंट्स क्लासरूम में लगी बडी स्क्रीन पर टीचर को पढाते हुए भी देखते हैं। इससे उन्हें ऐसा नहीं लगता कि वे बिना टीचर के पढाई कर रहे हैं।
स्टूडेंट्स को कोर्स पर आधारित पर्याप्त स्टडी मैटीरियल भी उपलब्ध कराया जाता है। ताकि वे रेगुलर पढाई कर सकें। समय-समय पर एग्जाम होता है और फाइनल एग्जाम क्वालिफाई करने के बाद उन्हें रेगुलर कोर्सो की भांति मान्यता प्राप्त प्रमाण पत्र प्रदान किया जाता है, जिसके आधार पर वे सरकारी और निजी या फिर विदेश में कहीं भी अपने अनुकूल जॉब पा सकते हैं। महत्वपूर्ण बात यह है कि ऐसे कोर्स बेहद कम फीस में और अपने आस-पास स्थित स्टडी सेंटर से ही किए जा सकते हैं। ऐसे कोर्स उच्च शिक्षा के क्षेत्र में उपलब्ध हैं और विश्वविद्यालय अनुदान आयोग द्वारा मान्यता प्राप्त हैं।
उच्च शिक्षा हासिल करने वाले स्टूडेंट्स की लगातार बढती संख्या को देखते हुए डिस्टेंस लर्निग से शिक्षा प्रदान करने वाले ऐसे संस्थान तेजी से लोकप्रिय हो रहे हैं। इस माध्यम के उपलब्ध हो जाने से उन स्टूडेंट्स को काफी लाभ हो रहा है, जिन्हें महानगरों या बडे शहरों में न जा पाने के कारण उच्च शिक्षा से वंचित रहना पडता था। ये कोर्स ग्रामीण और सुदूरवर्ती क्षेत्रों के युवाओं के लिए बेहद उपयोगी हैं। इन कोर्सो की लोकप्रियता को देखते हुए आज भारत में इग्नू के अलावा दस अन्य विश्वविद्यालय भी डिस्टेंस एजुकेशन से तमाम कोर्स उपलब्ध करा रहे हैं। इन विश्वविद्यालयों के अलावा देश भर में आज 54 से अधिक डिस्टेंस लर्निग इंस्टीटयूट भी हायर एजुकेशन की जरूरत को पूरा कर रहे हैं।
इग्नू के प्रमुख कोर्स
कम्प्यूटर ऐंड लाइब्रेरी ऐंड इन्फॉर्मेशन साइंसेज : इसमें मास्टर ऑफ कम्प्यूटर अप्लीकेशंस, बैचलर ऑफ कम्प्यूटर अप्लीकेशंस, पीजी डिप्लोमा इन लाइब्रेरी ऑटोमेशन ऐंट नेटवर्किग आदि शामिल हैं।
जर्नलिज्म, कम्युनिकेशन ऐंड क्रिएटिव राइटिंग : इसके तहत पीजी डिप्लोमा इन ट्रांसलेशन, जर्नलिज्म ऐंड मास कम्युनिकेशन, ऑडियो प्रोग्राम प्रॉडक्शन, रेडियो प्रसारण, डिप्लोमा इन क्रिएटिव राइटिंग इन इंग्लिश आदि शामिल हैं।
इंजीनियरिंग ऐंड रूरल डेवलॅपमेंट :
इस प्रोग्राम के अंतर्गत बीटेक-सिविल (कॅन्स्ट्रक्शन मैनेजमेंट), वाटर रिसोर्स इंजीनियरिंग, मैकेनिकल इंजीनियरिंग, पीजी डिप्लोमा इन रूरल डेवलॅपमेंट, एडवांस डिप्लोमा इन वाटर रिसोर्स।
एरिया स्फेसिफिक अवेयरनेस ऐंड मैनपॉवर डेवलॅपमेंट प्रोग्राम्स : इस प्रोग्राम के तहत शामिल विषय बेहद महत्वपूर्ण हैं। इनमें शामिल विषयों के नाम हैं-पीजी डिप्लोमा इन डिजास्टर मैनेजमेंट, इनवॉयरमेंट ऐंड सस्टेनेबल डेवलॅपमेंट, डिप्लोमा इन वैल्यू एडेड प्रॉडक्ट फ्रॉम फ्रूट्स ऐंड वेजिटेबल्स, पल्सेज ऐंड ऑयलसीड्स, मीट टेक्नोलॉजी आदि हैं। पता : इंदिरा गांधी नेशनल ओपेन यूनिवर्सिटी (1985), मैदान गढी, नई दिल्ली,फोन : 91-11-29532321, 29535062-65,
ई-मेल rmohan@ignou.ac.in,
वेबसाइट www.ignou.ac.in
टेक्नोलॉजी से पॉपुलर हुए कोर्स
इग्नू के कोर्स आज के समय के अनुसार कितने अपडेटेड हैं?
इग्नू डिस्टेंस ओपेन लर्निग के माध्यम से उच्च और वोकेशनल शिक्षा प्रदान करने वाला देश का सबसे बडा संस्थान है। इसकी सबसे बडी चुनौती देश के दूर-दराज के उन इलाकों तक उपयोगी शिक्षा का प्रसार करना है, जहां के लोग शहर जाकर पढाई नहीं कर सकते। इसके लिए हमने सैटेलाइट की मदद ली है। हमारी कोशिशों से इसरो ने इसी उद्देश्य से एडुसैट का प्रक्षेपण किया था। इसके अलावा, अब हम कम्युनिटी रेडियो, कम्युनिटी कॉलेज और अब मोबाइल एजुकेशन जैसे माध्यमों का भी इस्तेमाल कर रहे हैं।
शिक्षा में मोबाइल का उपयोग कैसे हो रहा है?
चूंकि अब मोबाइल का प्रसार गांव-गांव तक हो गया है, ऐसे में हमने मोबाइल फोन के माध्यम से स्टडी मैटीरियर प्रोवाइड करने और ऑन-डिमांड ऑब्जेक्टिव टेस्ट लेने की व्यवस्था शुरू की है। ऑन-डिमांड का मतलब है-किसी कोर्स का स्टूडेंट जब यह सूचना देगा कि वह अब परीक्षा देने के लिए तैयार है, तभी उसका टेस्ट होगा।
टेक्नोलॉजी का और किस तरह प्रयोग हो रहा है?
हम गांव-गांव में उपलब्ध एसटीडी बूथ के माध्यम से टेली सेंटर/विलेज नॉलेज सेंटर मैनेजमेंट कोर्स शुरू कर रहे हैं। इसके तहत बूथ चलाने वाले व्यक्ति को ट्रेनिंग देकर डिप्लोमा प्रदान किया जाएगा। यह ट्रेंड व्यक्ति गांव के लोगों को कॉल सेंटर, टेलीकम्युनिकेशन ट्रेनिंग देगा, ताकि वे टेलीकॉम इंडस्ट्री में बेहतर जॉब पा सकें। इसके लिए इग्नू टेलीसेंटरडॉटओआरजी के साथ टाई-अप कर रहा है। इस प्रोग्राम के तहत एक लाख से अधिक टेलीसेंटर्स व विलेज नॉलेज सेंटर्स मैनेजर्स बनाना है।

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Friday, December 5, 2008

कामकाजी प्रशिक्षण के बेहतर अवसर मुहैया कराता है इग्नू...

रवि शंकर विश्वकर्मा मप्र के बुंदेलखण्ड के एक सुदूर गांव में रहते हैं और संयुक्त परिवार के सदस्य हैं। खेती-बाडी और बढईगिरी से गुजारा करने वाले उनके परिवार की आर्थिक स्थिति बहुत अच्छी नहीं है। किसी तरह उन्होंने बारहवीं तक की पढाई की। वह कोई कामकाजी प्रशिक्षण लेकर खुद का कोई उद्यम आरंभ करना चाहते थे, लेकिन उनके आस-पास ऐसी सुविधा नहीं थी।

जब उन्होने अपने मन के इस दर्द को शहर में रहने वाले अपने बचपन के एक मित्र से व्यक्त किया, तो उन्होंने इग्नू से संपर्क करने का सुझाव दिया। संयोग से इग्नू में उनकी रुचि का बढ़ईगिरी प्रशिक्षण का सर्टिफिकेट पाठ्यक्रम मौजूद था और वह भी नाममात्र के शुल्क पर। खास बात यह है कि उन्हें इसके लिए कहीं जाना भी नहीं था। उन्हें गांव की पंचायत के टीवी, अपने रेडियो और मोबाइल फोन के माध्यम से ही बढ़ईगिरी का व्यावसायिक प्रशिक्षण मिल गया। इस कोर्स को करने के बाद उन्होंने स्थानीय बैंक से लोन लेकर गांव में ही फर्नीचर की एक दुकान खोल ली। कुछ ही वर्षो में उनकी दुकान चल निकली और उन्होंने अपने परिवार के सदस्यों को इससे जोडने के अलावा कुछ और लोगों को भी नौकरी पर रख लिया। इग्नू के ऐसे अनगिनत कोर्स हैं, जिनकी मदद से शहरों के साथ-साथ गांव-देहात तक के साधनहीन लोगों को न केवल जागरूक बनाया जा रहा है, बल्कि अल्पकालीन प्रशिक्षण देकर उन्हें उद्यमी बनने के लिए भी प्रोत्साहित किया जा रहा है। दरअसल, इंदिरा गांधी राष्ट्रीय मुक्त विश्वविद्यालय यानी इग्नू न केवल मुक्त व दूरस्थ शिक्षा के माध्यम से शहरी से लेकर दूर-दराज तक के लोगों को उच्च शिक्षा के साथ-साथ प्रोफेशनल शिक्षा प्रदान कर रहा है, बल्कि दुनिया की नई-नई तकनीकों व जानकारियों से भी लोगों को लगातार जागरूक कर रहा है। इग्नू उच्च शिक्षा प्राप्त करने की आकांक्षा रखने वाले उन सभी लोगों के लिए एक वरदान की तरह है, जो किसी कारण नियमित पढाई नहीं कर पाते। इस संस्थान में आज के हिसाब से लगभग सभी कोर्स उपलब्ध हैं और खास बात यह है कि इनकी विश्वसनीयता नियमित संस्थानों द्वारा दी जा रही शिक्षा से किसी मायने में कम नहीं है। इग्नू द्वारा संचालित अधिकांश कोर्सो में वर्ष में दो बार एडमिशन होते हैं।

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Wednesday, December 3, 2008

कम्यूटर साईंस की पढ़ाई मे प्रोग्रामिंग का ज्ञान भी जरूरी....

कम्प्यूटर साइंस कोर्स में आपको केवल कम्प्यूटर्स के बारे में ही नहीं पढना होता है, बल्कि मैथमेटिक्स, इलेक्ट्रॉनिक्स, इकोनॉमिक्स व कॉमर्स भी इस विषय के अभिन्न अंग हैं। यही कारण है कि प्लानिंग और स्ट्रेटेजी के साथ अपनी तैयारी शुरू करके ही आप इस कोर्स में अपनी राह आसान बना सकते हैं।

सिलेबस के कंट्रोल पैनल
मैथमेटिक्स
कम्प्यूटर साइंस का महत्वपूर्ण आधार विषय है-मैथमेटिक्स। इसके डिफ्रेंशियल इक्वेशंस, कैलकुलस, प्रॉबेबिलिटी जैसे टॉपिक्स पर आप लगातार अभ्यास से अच्छी पकड बना सकते हैं। इसके लिए इन बातों पर विशेष रूप से गौर करें :
एक्सरसाइज सॉल्व करने के लिए जो गाइडलाइंस निर्धारित हैं, उनके मुताबिक ही हर सेक्शन और टॉपिक का अभ्यास करें।

इलेक्ट्रॉनिक्स
इलेक्ट्रॉनिक्स के सेक्शन में डिजिटल सर्किट्स और इक्विपमेंट्स को समझें। इससे प्रैक्टिकल करने में आसानी होगी। इसके साथ ही, निम्नलिखित बातों का ध्यान रखें :
फंडामेंटल्स पर पकड बनाएं।
कॉन्सेप्ट्स और सर्किट को समझने के लिए अधिक से अधिक समय दें।
एक से अधिक रेफरेंस बुक्स से कंसल्ट करें।

कम्प्यूटर्स
कम्प्यूटर साइंस में कम्प्यूटर प्रोग्रामिंग के पेपर्स सबसे महत्वपूर्ण हैं। हालांकि, स्टूडेंट्स को ऑपरेटिंग सिस्टम, आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस, नेटवर्किग आदि को भी विस्तार से पढना होता है। इस सेक्शन के लिए विद्यार्थी इन बातों पर विशेष ध्यान दें :
प्रोग्रामिंग फंडामेंटल्स को रटें नहीं, समझें।
प्रोग्रामिंग के हर पेपर के साथ प्रैक्टिकल पेपर भी जरूर होता है। प्रोग्रामिंग लॉजिक को समझने के लिए यह इम्पॉर्टेट की है, इसलिए प्रैक्टिकल्स पर ज्यादा ध्यान दें।
प्रोग्रामिंग की हर रोज दो घंटा प्रैक्टि्स करें।

इकोनॉमिक्स व कॉमर्स

इस सेक्शन के लिए आप इकोनॉमिक्स व कॉमर्स के अंतर्गत आने वाले विषय क्षेत्रों, जैसे- डिमांड- सप्लाई, कारोबार, कस्टमर रिलेशंस आदि को ध्यान से समझें। आईटी और कॉमर्स के रिलेशनशिप को जानें। तथा इन बातों पर भी अमल करें :

नोट्स बनाएं।
कॉमर्स की मैगजीन्स व अखबार जरूर पढें।

प्रोग्रामिंग है सीएस की हार्ड डिस्क अधिकतर स्टूडेंट्स प्रोग्रामिंग से घबराते हैं। वैसे, प्रोग्रामिंग इतनी भी मुश्किल नहीं होती कि उसे समझा न जा सके। बस, कुछ बातों पर ध्यान दें, जैसे :

सबसे पहले प्रोग्रामिंग स्ट्रक्चर्स को समझें।
प्रोग्रामिंग की प्रैक्टिस करते समय शुरुआत छोटी-छोटी प्रॉब्लम्स से करें।
प्रॉब्लम को कागज पर पहले मैनुअली सॉल्व कर लें। इसके बाद इससे संबंधित सभी स्टेप्स को सिक्वेंस में आसान लैंग्वेज में लिखकर एल्गोरिथम बना लें।

एल्गोरिथम बनाने के बाद हर स्टेप को प्रोग्राम में कन्वर्ट करें।
प्रोग्राम को ड्राई रन करके देखें और लॉजिकल एरर्स को ठीक करें।
अब प्रोग्राम को कम्प्यूटर पर रन करें।

प्रोग्रामिंग एरर्स को समझने के लिए लैब मैनुअल का प्रयोग करना आवश्यक है।
बुक्स करें लॉग-ऑन कम्प्यूटर साइंस पर कुछ अच्छी किताबों के नाम इस प्रकार हैं :

द कम्पलीट रेफरेंस जावा : 2-नॉटन ऐंड शील्ड
द कम्पलीट रेफरेंस सी++ : एच. शील्ड
डाटा स्ट्रक्चर्स, ऐप्लिकेशंस इन सी++ : क्रुस
फंडामेंटल्स ऑफ डाटा स्ट्रक्चर्स : हॉरोविज
कम्प्यूटर सिस्टम आर्किटेक्चर : मॉरिस मानो

डिजिटल इलेक्ट्रॉनिक्स : मॉरिस मानो
कम्प्यूटर ऑर्गनाइजेशन ऐंड ऑर्किटेक्चर : डब्ल्यू स्टॉलिंग्स
कम्प्यूटर अलगोरिथम्स : कॉरमन
प्रोग्रामिंग विद सी++ऐंड डाटा स्ट्रक्चर्स : मारिया लिटविन ऐंड गैरी लिटविन

नेट से लें बेस्ट
गूगल सर्च इंजन तो आपके लिए बेहतर साबित होगा ही, इसके अलावा आप विकी-पीडिया की साइट पर जाकर भी बहुत-सी जानकारियां हासिल कर सकते हैं।

मैगजीन्स से भी लें ज्ञान
विषय के प्रति रुचि पैदा करने और नवीनतम जानकारियों के लिए इस विषय पर कुछ अच्छी मैगजीन्स हैं :
डिजिट, इलेक्ट्रॉनिक्स फॉर यू, पीसी क्वेस्ट, साइंस रिपोर्टर, साइबर व‌र्ल्ड और कम्प्यूटर्स

क्या करें, क्या न करें
जब तक एक टॉपिक क्लियर न हो, तब तक अगले टॉपिक की ओर बढने से बचें।

असाइनमेंट्स बनाएं। कम्प्यूटर एवं इलेक्ट्रॉनिक्स से संबंधित सेमिनार व वर्कशॉप जरूर अटेंड करें।
प्रैक्टिकल करने से कभी जी न चुराएं।

बातें छोटी मगर काम की
प्रोग्रामिंग के प्रश्नों में प्रोग्राम की हर इंस्ट्रक्शन, लूप, वैरिएबल्स के लिए कमेंट लिखना जरूरी है।
इलेक्ट्रॉनिक्स के प्रश्नों में क्लियर सर्किट्स बनाकर उनकी वर्किग समझाएं।
एरर्स बताने वाले प्रश्नों में इंस्ट्रक्शंस लिखकर एरर बताएं।
आउटपुट वाले प्रश्नों का उत्तर लिखते समय प्रॉपर सिक्वेंस का ध्यान रखें।

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Monday, November 24, 2008

कैरियर का राजमार्ग-पढ़ांए और कमांए.. भाग-2

देश में मौके
भारत की बात करें, तो सरकारी नीतियों और लोगों में जागरूकता के कारण शिक्षण संस्थानों व स्कूलों में टीचर्स की मांग में जबर्दस्त बूम है। शिक्षा के मोर्चे पर सरकार काफी मशक्कत कर रही है और इसका सारा दारोमदार टीचर्स के कंधों पर है। सरकारी शिक्षक मूल रूप से स्कूलों, कॉलिजों, विश्वविद्यालयों, पॉलीटेक्निक व अन्य शिक्षण संस्थानों में नियुक्त किए जाते हैं। शिक्षकों के स्तर होते हैं- नर्सरी टीचर, प्राइमरी टीचर, टीजीटी व पीजीटी। इसी तरह, कॉलिजों में लेक्चरर, रीडर, प्रफेसर तथा आर्ट व क्राफ्ट कॉलिजों में इंस्ट्रक्टर नियुक्त किए जाते हैं। निजी क्षेत्र के तकनीकी कॉलिजों में भी शिक्षकों की लगातार डिमांड रहती है।
काम का स्वरूप
सभी टीचर्स का वर्कप्रोफाइल अलग होता है। नर्सरी टीचर जहां छोटे बच्चों में अच्छी आदतें व आपस में मिल-जुलकर कार्य करने की भावना विकसित करते हैं, वहीं प्राइमरी टीचर्स बच्चों के शौक व आदतों के अनुसार कार्य करने पर बल देते हैं। ग्रैजुअट व पोस्ट ग्रैजुअट टीचर्स को टीजीटी व पीजीटी कहा जाता है। ऐसे अध्यापकों पर अधिक दबाव रहता है।
वे हाईस्कूल और इंटरमीडिएट लेवल के बच्चों पर फोकस करते हैं। इसी तरह, खेलकूद, नाटक, संगीत आदि से संबंधित शिक्षक भी अपने फील्ड के महारथी तैयार करते हैं। कॉलिजों में प्रफेसर शोधार्थियों का मार्गदर्शन करते हैं और लेक्चरर पढ़ाई का कार्य करते हैं। इन पदों पर रहते हुए आपको विशेष सावधानी की जरूरत होती है, क्योंकि युवाओं को सही समय पर आपके सही मार्गदर्शन की जरूरत होती है।

एजुकेशनल क्वॉलिफिकेशन
नर्सरी टीचर
नर्सरी टीचर छोटे बच्चों को पढ़ाते हैं। इन कक्षाओं में पढ़ाने के लिए उम्मीदवार के पास नर्सरी टीचर टेनिंग का एक वर्षीय प्रमाण-पत्र होना बेहद जरूरी होता है। आप चाहें, तो दो वर्षीय नर्सरी टीचर ट्रेनिंग भी कर सकते हैं। ये पाठ्यक्रम देश के विभिन्न पॉलिटेक्निकों व व्यावसायिक शिक्षण संस्थानों में चलाए जाते हैं। इस कोर्स के बाद प्राइवट व सरकारी स्कूलों में छोटे बच्चों को पढ़ाने का काम किया जा सकता है।
प्राइमरी टीचर
प्राइमरी टीचर पहली से पांचवीं कक्षाओं तक के बच्चों को पढ़ाते हैं। इसके लिए दो वर्षीय टीचर ट्रेनिंग का डिप्लोमा होना जरूरी है। यह डिप्लोमा विभिन्न शिक्षण संस्थानों में संचालित किया जाता है। इसके अलावा, अगर आप जेबीटी (जूनियर बेसिक ट्रेनिंग) पास हैं, तो आपको नौकरी मिलना बेहद आसान हो जाता है। कई राज्यों में इसे अनिवार्य योग्यता के तौर पर लागू किया गया है। वैसे, टीचर्स की नियुक्ति के लिए सभी राज्यों में अपने कायदे-कानून हैं।
टीचर ट्रेनिंग के डिप्लोमा में प्रवेश के लिए आवेदक का 50 फीसदी अंकों के साथ 12वीं पास होना जरूरी है। स्टूडंट्स इस बात पर भी गौर करें कि वे जहां से डिप्लोमा करें, वह संस्थान राष्ट्रीय अध्यापक शिक्षा परिषद् द्वारा मान्यता प्राप्त हो। इस डिप्लोमा को करने के बाद विभिन्न राज्यों में सहायक अध्यापक नियुक्त किए जाते हैं। केंद्र शासित प्रदेश दिल्ली में देश के किसी भी राज्य से दो वर्षीय टीचिंग डिप्लोमाधारी उम्मीदवार नौकरी प्राप्त कर सकते हैं। इस जॉब के लिए प्रवेश परीक्षा होती है, जो दिल्ली अधीनस्थ सेवा चयन बोर्ड द्वारा आयोजित की जाती है। सहायक अध्यापकों की प्रत्येक वर्ष हजारों भर्तियां होती हैं।
टीजीटी व पीजीटी
ये अध्यापक हाईस्कूल और इंटरमीडिएट स्तर के स्टूडंट्स को पढ़ाते हैं। टीचर्स को गैजुअट व पोस्ट ग्रैजुअट होने के साथ-साथ बीएड डिग्री धारक होना भी जरूरी है। देश के विभिन्न विश्वविद्यालयों में बीएड पाठ्यक्रम की सुविधा है। कुछ संस्थानों को छोड़कर सभी विश्वविद्यालयों में रेग्युलर बीएड, एमएड कराया जाता है। इसके लिए उम्मीदवार को 50 फीसदी अंकों के साथ ग्रैजुअशन, पोस्ट ग्रैजुअशन होना जरूरी है। कॉरस्पॉन्डंस से बीएड कोर्स उन्हीं उम्मीदवारों को कराया जाता है, जो टीचिंग में कार्यरत होते हैं। बीएड के बाद वे टीजीटी व पीजीटी नियुक्त किए जाते हैं।
कॉलिज लेक्चरर
यूजीसी ने 1991 से लेक्चरर पद के लिए न्यूनतम शैक्षणिक योग्यता लागू की है। इसके लिए आवेदक को 55 फीसदी अंकों के साथ संबंधित विषय में स्नातकोत्तर होना चाहिए। साथ ही यूजीसी की ओर से आयोजित नेट परीक्षा उत्तीर्ण होना भी जरूरी है, जबकि 2005 में आई यूजीसी की गाइडलाइन की बात करें, तो पीएचडी होल्डर उम्मीदवार के नेट पास न होने की सूरत में भी वह लेक्चरर नियुक्त हो सकता है। अगर उम्मीदवार पीएचडी के साथ नेट भी कर लेता है, तो संभावनाएं अधिक होती हैं।
टीचर फॉर स्पेशल चाइल्ड
आप मंदबुद्धि या विकलांग बच्चों के अध्यापक बनकर देश सेवा भी कर सकते हैं, लेकिन इसके लिए एजुकेशनल कवॉलिफिकेशन के अलावा धैर्य, व्यवहार कुशलता, मानवीय सहानुभूति जैसे व्यक्तिगत गुण होने भी जरूरी हैं। इसके लिए उम्मीदवार को 50 फीसदी अंकों के साथ ग्रैजुअट होना चाहिए। इस कोर्स के लिए प्रवेश परीक्षा व साक्षात्कार होते हैं। संस्थानों की बात करें, तो आप नैशनल इंस्टिट्यूट फॉर विज़ुअली हैंडीकैप्ड; राजपुर रोड; देहरादून, नैशनल इंस्टिट्यूट फॉर द आर्थोपेडिकली हैंडीकैप्ड; जीटी रोड; कोलकाता और नैशनल इंस्टिट्यूट फॉर द मेंटली हैंडीकैप्ड; मनोविकास नगर; सिंकदराबाद से कोर्स कर सकते हैं।
वेतन
वेतन की बात करें, तो इस फील्ड में तनख्वाह शुरुआती दौर में ही अच्छी मिल जाती है। आपको काम में केवल छह से आठ घंटे गुजारने होते हैं। सरकारी स्तर पर सैलरी पूर्वनिर्धारित होती है, जिस पर सरकार का नियंत्रण होता है। प्राइवट लेवल पर वेतन आपके अनुभव और संस्थान की साख पर निर्भर करता है। अगर विदेश में शिक्षक के तौर पर काम करने का अवसर मिल जाता है, तो हर माह आमदनी लाखों में होती है।

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Saturday, November 22, 2008

कैरियरा वॉच -पढ़ांए और कमांए.. भाग-1

यह बात किसी से छुपी नहीं है कि ज्ञान बांटने से कम नहीं होता, बल्कि और बढ़ जाता है। मौजूदा स्थिति पर नजर डालें, तो आज ज्ञान बांटने वालों को न सिर्फ मान-सम्मान बल्कि दौलत और शोहरत भी खूब मिल रही है। एक टीचर के रूप में आज न सिर्फ देश में, बल्कि विदेश में भी करियर के शानदार अवसर उपलब्ध हैं।
वे दिन लद गए, जब टीचिंग महिलाओं के लिए पेटंट और पुरुषों के लिए आराम का काम माना जाता था। आज तो टीचिंग ऐसा राइज़िंग करियर ऑप्शन है, जिसके माध्यम से आप न सिर्फ नई पीढ़ी की नींव मजबूत करने में अहम भूमिका अदा करते हैं, बल्कि आर्थिक रूप से अपनी नींव भी मजबूत कर सकते हैं।

विदेश में करियर

जबसे फॉरन यूनिवर्सिटीज़ में भारतीय शिक्षकों को रोजगार मिलने लगा है, तबसे टीचिंग का करियर और अधिक लाइमलाइट में आ गया है। वर्ष 2004 में भारत से मस्कट का रुख करने वाले दिल्ली विश्वविद्यालय के शिक्षक डॉ. गुरप्रीत सिंह टुटेजा बताते हैं कि वह मस्कट में पढ़ाने गए थे। उस दौरान उन्होंने वहां 50 हजार रुपये प्रतिमाह की सैलरी से शुरुआत की थी। जब वह दो सेमेस्टर पूरे करके भारत लौटने वाले थे, तब उन्हें एक लाख रुपये प्रतिमाह की जॉब का ऑफर मिल गया।
डॉ. टुटेजा के उदाहरण से ही पता चल जाता है कि विदेशों में भारतीय टीचर्स के लिए जॉब की संभावनाएं कितनी बढ़ गई हैं! मेडिकल, फैशन डिजाइनिंग और इंजीनियरिंग जैसे तकनीकी विषयों के अलावा आजकल हिंदी और संस्कृत जैसे भाषागत विषयों को पढ़ाने के लिए भी विदेशों में भारतीय शिक्षक काफी डिमांड में हैं।

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Wednesday, November 19, 2008

व्यवहारिक मनोविज्ञान समस्याओं को करे आसान..

अप्लॉयड साइकोलॉजी, साइकोलॉजी के सैद्धांतिक रूप को प्रायोगिक स्वरूप में समझने और उपयोग में लाने का विज्ञान है। इसकी सहायता से कोई भी स्टूडेंट केवल खुद के व्यक्तित्व का आकलन कर सकता है, बल्कि काउंसलिंग अन्य माध्यमों से लोगों की समस्याओं को भी बहुत हद तक सुलझा सकता है। आइए जानते हैं कि इसे समझने के लिए किन-किन बातों का ध्यान रखना जरूरी है :


कोर्स कंटेंट पर दें ध्यान
अप्लॉयड साइकोलॉजी के अंतर्गत विद्यार्थियों को साइकोलॉजी के आधारभूत सिद्धांतों को तो पढना ही होता है, इसके साथ ही ह्यूमन रिसोर्स डेवलॅपमेंट, ऑर्गेनाइजेशनल बिहेवियर, बिहेवियरल रिसर्च भी इस विषय का हिस्सा होता है। अप्लॉयड साइकोलॉजी को समझने के लिए थ्योरी क्लासेज और प्रैक्टिकल्स दोनों का अनुपात बराबर होना चाहिए। स्टूडेंट्स हर टॉपिक की थ्योरी को समझें। इसके अलावा प्रैक्टिकल्स के जरिए उन्हें व्यावहारिक रूप में समझने का अभ्यास करें। थ्योरी क्लासेज में स्टूडेंट्स इन बातों पर जरूर ध्यान दें :

मानव व्यवहार अप्लॉयड साइकोलॉजी का आधार है। जो भी पढाया जाए, उसे ह्यूमन बिहेवियर से लिंक करके समझें।
कोई टर्म समझ में न आए, तो प्रॉब्लम को प्राध्यापक से संपर्क कर तुरंत क्लियर करें।
हर पेपर के लिए अलग-अलग नोट बुक बनाएं। ऐसा करने से पिछली क्लास में क्या पढाया गया है, उसे ढूंढने में टाइम खराब नहीं होगा।

किताबें पढें, आगे बढें
विषय के बेसिक्स को समझने के बाद अधिक से अधिक पुस्तकें पढने की बजाय एक ही किताब को कई बार पढें। इस विषय पर कुछ अच्छी किताबें हैं :
इंट्रोडक्शन टू साइकोलॉजी : हिलगार्ड ऐंड ऐटकिंस इंट्रोडक्शन टू जनरल साइकोलॉजी : मॉर्गन ऐंड किंग थ्योरीज ऐंड प्रैक्टि्स ऑफ साइकोलॉजिकल टेस्टिंग : एफ.एस.फ्रीमैन सोशल साइकोलॉजी : आर.ए.बैरन ऐंड बैरन

ऑर्गेनाइजेशनल बिहेवियर : एफ.लूथंस
फाउंडेशन ऑफ बिहेवियरल रिसर्च : केलिंगर
साइकोलॉजिकल टेस्टिंग : ऐनेस्ट्सी
हैंडबुक ऑफ काउंसिलिंग साइकोलॉजी : आर.एस.वूफ

नोट्स बनाना है जरूरी
आप हर वक्त किताब से ही नहीं पढ सकते, इसलिए नोट्स बनाना बेहद जरूरी है। नोट्स बनाते समय इन बातों पर विशेष रूप से ध्यान दें :
हमेशा लूज शीट पर ही नोट्स बनाएं। इससे नोट्स को अपडेट करने में आसानी होगी।
बेसिक टेक्स्ट बुक को नोट्स का प्रमुख आधार बनाएं।
स्टैंडर्ड रेफरेंस बुक्स से आप इम्पॉर्टेट प्वॉइंट्स अपने नोट्स में जोडें।
मैगजीन/जर्नल/इंटरनेट से प्राप्त जानकारियों को भी जहां उपयोगी समझें, वहां लिखें।

उत्तर लिखने का करें अभ्यास
जनरल साइकोलॉजी के आधारभूत सिद्धांतों को समझने के लिए जरूरी है कि विद्यार्थी घर पर खुद ही इस विषय के महत्वपूर्ण टॉपिक्स पर अपने प्रश्न बनाएं और उनके उत्तर लिखने की कोशिश करें। इसके बाद उसे अपने प्राध्यापकों को दिखाएं और उस पर उनकी सलाह से सुधार करें। आपकी परफॉर्मे स से प्राध्यापक जान लेंगे कि आपको कहां पर और किस तरह की परेशानी आ रही है और उसे कैसे दूर किया जा सकता है।

नेट से जुटाएं इन्फॉर्मेशन
अप्लॉयड साइकोलॉजी के विद्यार्थी गूगल सर्च इंजन पर इससे संबंधित किसी भी टॉपिक को टाइप करके बहुत-सी उपयोगी सामग्री सर्च कर सकते हैं। इसके साथ ही इस विषय में लेटेस्ट जानकारियों से भी खुद को अपडेट रख सकते हैं।

अखबार/मैगजीन्स/जर्नल्स
अप्लॉयड साइकोलॉजी के स्टूडेंट्स के लिए कुछ उपयोगी मैगजीन्स और जर्नल्स के नाम हैं : टाइम, साइंस रिपोर्टर, सोशल साइकोलॉजिकल क्वार्टरली, क्लीनिकल साइकोलॉजिकल क्वार्टरली

क्या करें, क्या न करें
विषय को रुचि के साथ पढें।
रेगुलर सेल्फ असेसमेंट करते रहें।
इस विषय में आउटडोर प्रैक्टिकल्स के लिए एनजीओ और पुनर्वास केंद्रों में भी जाना पडता है। वहां अधिक से अधिक व्यावहारिक ज्ञान अर्जित करने की कोशिश करें।

इस विषय से संबंधित सेमिनार और कार्यशालाओं को जरूर अटेंड करें।
मौका मिले, तो कुछ मनोवैज्ञानिकों से मिलने की कोशिश करें। इससे आपको कुछ नया जानने-समझने को मिलेगा।

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Monday, November 17, 2008

फीस तय करने मे नहीं चलेगी निजी कॉलेजों की मनमानी....

इंजीनियरिंग, मैनेजमेंट, फार्मेसी सहित तमाम टेक्नीकल कोर्स चलाने वाले कालेजों की मनमानी पर शिकंजा कसने जा रहा है। कोई भी कालेज फीस के मामले में छात्र-छात्राओं का शोषण नहीं कर सकेगा। टेक्नीकल कोर्सेस की मान्यता देने वाली अखिल भारतीय तकनीकी शिक्षा परिषद अपने कोर्सेस की फीस भी अब खुद ही तय करेगी। यह व्यवस्था अगले सत्र से ही लागू हो जाएगी। पूरे देश में एकीकृत फीस स्ट्रक्चर घोषित करने में जुटी एआईसीटीई की तैयारी लगभग अंतिम दौर में पहुंच गई है

प्रो.रंगनाथ मिश्र की अध्यक्षता में राष्ट्रीय स्तर की कमेटी ने अन्य राज्यों के अलावा मध्यप्रदेश के कालेजों का दौरा भी हाल ही में पूर्ण कर लिया है। अब केवल एक या दो राज्य ही बचे हैं। सूत्रों के मुताबिक यह उच्च स्तरीय कमेटी रेंडम टेस्टिंग के तौर पर कालेजों का दौरा कर रही है। मध्यप्रदेश में भी चुनिंदा कालेजों का दौरा किया है। इसमें छोटे-बड़े शहर, कस्बों के अलावा नए और पुराने कालेजों को चुना है। कालेजों में उपलब्ध सुविधाओं के अलावा इनकी आय-व्यय, पढ़ाई का स्तर, टीचिंग स्टॉफ की स्थिति, योग्यता आदि को बारीकी से देखा जा रहा है।
सूत्रों के मुताबिक फीस तय करते समय कालेजों के स्तर के साथ ही प्रदेश की प्रति व्यक्ति आय को भी ध्यान में रखा जाएगा। संभव है इसमें कालेजों को अलग-अलग श्रेणी में रखकर उनके लिए फीस तय की जाए। उच्च स्तरीय कमेटी इस माह दौरे पूर्ण कर लेगी। दिसंबर में कमेटी अपनी रिपोर्ट भी सौंप देगी। अगले सत्र से यह फीस लागू होना है, इसलिए इसकी घोषणा जनवरी में ही कर दी जाएगी।
हर कालेज होगा बाध्य : एआईसीटीई की मान्यता पर कोर्स चलाने वाला हर कालेज फीस के लिए भी बाध्य होगा। तय फीस से अधिक वसूली करने पर कालेज की मान्यता भी खतरे में पड़ सकती है। इसके लिए कालेजों की मानीटरिंग की भी पर्याप्त व्यवस्था की जाएगी। उल्लेखनीय है कि इस मामले में करीब एक साल से मशक्कत चल रही थी। एआईसीटीई द्वारा श्री मिश्र की अध्यक्षता में गठित कमेटी ने जून में अपनी सिफारिशें सौंप दी थी। इनमें कमेटी ने हर राज्य का दौरा कर एकीकृत फीस तय करने का सुझाव दिया था।

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